अंबिकापुर। (आनंद शर्मा अन्नू)। यूं तो चलना , दौड़ना , वाहन चालन दूरी तय करनें के उपक्रम हैं लेकिन नागरिक सुरक्षा संबंधी कानूनों में नियत (जानबुझकर/लापरवाही) और नियति (सावधानी पूर्वक और सचेत हो ) को अलग कर दण्ड का दायरा भी उसी अनुरूप समायोजित किया जाता रहा है ।
कानून की जरूरत क्यों ??
भारत यद्यपि USA, जापान जितना विकसित नहिं लेकिन विश्व के आबादी में पहला स्थान और सड़क नेटवर्क की लंबाई में विश्व में अमेरिका के बाद दूसरा स्थान रखता है ,यहाँ सड़क दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष लाखों मृत्यु होती है यहि सरकार के लिए चिंता का विषय है और भारत इसमें सतत् कमी चाहता है ।
बदलाव क्या ?
पूर्व के लगभग 150 साल पुराने ब्रिटिश कानून में सजा की अपनी लक्ष्य और निरूपण थे ,तब नियतवश/ जानबुझकर/लापरवाही से ठोकर मार भाग जाने की प्रवृत्ति न हो ,न्यून हो लेकिन वर्तमान परिदृश्य में जहाँ भारत में 4 लाख के करीब छोटी-बड़ी सड़क दुर्घटनाए हो रही हैं कानून में परिवर्तन अपरिहार्य था । बदलाव बतौर पुराने कानून के अल्प जुर्माना और अधिकतम 2 वर्ष की सजा को अब बढ़ाकर जुर्माने की अधिकतम राशि 10 लाख व् कारावास की अधिकतम अवधि 104(1) के मामलों में 7 वर्ष और 104(2) के मामलों में 10 वर्ष रखी गयी है , चूंकि ऐसे अपराध आपराधिक मानव वध प्रवृत्ति के नहिं मानें जाते अतः न्यूनतम कारावास और जुर्माने की अवधि/राशि 'आशय' के आधार पर कुछ भी हो सकती है ।
दस वर्ष की ही सजा मिलेगी, सत्य नही
परिवर्तन का प्रतिरोध एक स्वाभाविक प्रक्रिया है अफवाहों के बीच जब तक सही जानकारी का प्रसार न हो उसे स्वीकार नहिं किया जाता , अगर सजा कठोर न हो तो कानून का दोयम दर्जे का और मनमौजी अनुपालन हि दिखेगा लेकिन सावधानी पूर्वक , सहि उद्देश्य से कार्य करनें पर भी दुर्घटना कारित हो जनहानि हो जाए तो चालक क्या करे ?? चालक की उम्र और आय सीमा दोनों ही नये दण्ड प्रावधानों का भार वहन नहीं कर सकेंगी लेकिन यह विश्वास की 10 वर्ष की ही सजा मिलेगी एक पूर्ण सत्य नही है ।
उपाय क्या ??
कैबिनेट सामान्य प्रस्ताव द्वारा विधायी प्रक्रिया के माध्यम से एक्ट के किसी भाग में संशोधन कर सकती है । चालक /परिवहनकर्ता के स्तर पर कम से कम सामने की ओर से यात्रावधि की विडियो रिकार्डिंग होनी चाहिए जिससे बतौर साक्ष्य 'आशय' शब्द को परिभाषित किया जा सके और कठोर दण्ड के प्रति एक बीमा कवच हासिल किया जा सके।
सरकार की मंशा ??
चालकों को ज्यादा जवाबदेह , सतर्क और साफ नियति बनाने की है।इस प्रक्रम तक पहुंचने में बहुत से बातों का ध्यान रखा गया है जैसे कि चालक को पर्याप्त उपाय दिये गये हैं और जनता में कठोर दण्ड मिलेगा का विश्वास जिसके अभाव में जनता हिंसक होती थी और चालक जान बचाने भागने को मजबुर होता था ।
विशेष संवाददाता
आनंद शर्मा (अन्नू)




