तुलसी साहित्य समिति द्वारा समाजसेवी स्व. आत्माराम व सावित्री देवी जायसवाल की पुण्यतिथि पर कवयित्री डॉ. माधुरी जायसवाल के निवास पर वरिष्ठ गीतकार रंजीत सारथी की अध्यक्षता में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गीता मर्मज्ञ पं. रामनारायण शर्मा, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कवयित्री गीता दुबे, चंद्रभूषण मिश्र, सच्चिदानंद पांडेय व आनंद सिंह यादव थे। संचालन कवि अजय सागर और संतोष सरल ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ स्व. आत्माराम व सावित्री देवी जायसवाल के छायाचित्रों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर डॉ. माधुरी जायसवाल द्वारा प्रस्तुत सरस्वती-वंदना से हुआ। सच्चिदानंद पांडेय ने कहा कि स्व. आत्माराम जायसवाल ने अपने समाज और गांव की निस्वार्थ सेवा की और उसके विकास के लिए अनेक कार्य भी किए। पं. रामनारायण शर्मा का कहना था कि वह स्वभाव से बड़े सरल और मिलनसार थे। उनका जुझारू और संघर्षप्रिय व्यक्तित्व आनेवाली पीढ़ियाें को प्रेरणा देता रहेगा। अनिल त्रिपाठी ने भी स्व. आत्माराम के गुणों का बखान किया और उन्हें एक अच्छा इंसान बताया। जिनके हृदय में परदुखकातरता, सेवा और सहयोग की भावना सदैव विद्यमान रही। काव्यगोष्ठी में कवि अजय सागर ने अपने श्रद्धास्पद के प्रति श्रद्धा सुमन समर्पित किए- तुम ही मेरी पूजा, तुम ही साधना हो। तुम ही हो गजल, मेरी गीतों की जां भी हो। गीता दुबे ने सच बोलने का सहज आग्रह किया- कहते हैं सच बोलो और प्रिय भी बोलो। अप्रिय सत्य ना बोलो, झूठ प्रिय ना बोलो। डॉ. माधुरी जायसवाल ने अपनी मां को याद किया- तू ही तो मेरी जीवन की रोशनी थी, तेरे बिन मेरा जीवन अधूरा है। उनकी पिता संबंधी कविता भी बड़ी मार्मिक रही- मुझ पर जितना गर्व किया है, उतनी भी कोई बात नहीं। आपके नाम से ज्यादा मेरी औकात नहीं। पुत्र कर्म ऐसा करे, बढ़े पिता का मान। उनको मिले समाज में, एक नई पहचान। कवयित्री पूनम दुबे 'वीणा' ने बरसात के मनभावन मौसम की ओर इशारा किया। सुन जरा बरसात की धुन। आ मितवा संग सपने बुन। उमड़-घुमड़ बदरी नाचे, पांखियों के कलरव सुन। कविवर श्यामबिहारी पांडेय ने भी मौजूदा वर्षाकाल में वनों के हर्षोल्लास को चित्रित किया- जंगलों ने आज फिर जीभर नहाया। जेठ बीता, लग रहा आषाढ़ आया। गीतकार देवेंद्रनाथ दुबे ने नायक की नायिका के प्रति सांत्वना को नुमायां किया- हरदम तेरे साथ रही, इन आंखों को समझा देना। दूर कहीं जब तुमसे हो तो सावन मत बरसा देना। राजेश पांडेय ने स्मृति गीत सुनाया- हुई आंख नम तुम्हारी याद में, बह रहे शबनम तुम्हारी याद में। रंजीत सारथी ने शिवभक्ति से ओतप्रोत सुमधुर गीत सुनाया- शिव तुम्हीं दया करो, तुम बिन हमारा कौन है? तुम ही माता, तुम ही पिता, तुम ही पालनहारा हो। आशुकवि विनोद हर्ष ने बेटियों को वर्षों की तपस्या का सुफल बताया- युगों-युगों के तप का परिणाम बेटियां, हर किसी को नहीं देते राम बेटियां।
हर लेखक की अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता होती है, कुछ उसूल होते हैं, कुछ है ध्येय होते हैं। कवि संतोष सरल ने अपनी लेखन-निष्ठा को सबसे साझा किया- दर्द में भी लिखता हूं मैं गीत खुशी के ऐ सरल। कलम रुक गई अगर तो जिंदगी ठहर जाएगी। चल पड़े हम उधर राहे- मंजिल जिधर जाएगी। यकीन है किस्मत भी इक दिन ये संवर जाएगी। आनंद सिंह यादव ने प्रेरक कविता प्रस्तुत की- संघर्ष की राहों में चलते रहो तुम। अंधेरों से लड़कर ही मिलती है रोशनी। हर गिरावट सिखाती है उठना फिर से। हार में भी छिपी होती है जीत की खुशी। प्रकाश कश्यप ने अपने सरगुजिहा गीत में जीवन की नश्वरता का चित्रण करते हुए अभिमान त्यागने और जवानों की तरह जीवन बिताने का आह्वान किया। काबर ले करथा गुमान दउवा। जिंदगी के नइए ठेकान दउवा। मरना तो सबला हवे इक दिन संगी। जिया तो जैसे जवान दउवा। कवि चंद्रभूषण मिश्र ने भी जीवनशैली में बदलाव की बात अपनी कविता में कही- लम्हा-लम्हा तेरा चेहरा सामने आता है, मेरे जीने का अंदाज बदल जाता है। अंत में संस्था के अध्यक्ष कवि मुकुंदलाल साहू ने पिता पर अनेक प्रभावी दोहे सुनाए और उनकी भूमिका, कार्यों और विशेषताओं का वर्णन किया- अनुपम होते हैं पिता, कर्मठ बड़े उदार। होते वे परिवार का, एक प्रमुख आधार। पिता सदा हैं आस्था, आस और विश्वास। दूर अंधेरे को करें, लाते वही उजास। पिता-वचन को मानकर, गए राम वनवास। जंगल में मंगल हुआ, मिटी जगत् की त्रास। पिता अगर बूढ़े हुए, मिले उन्हें सम्मान। उनकी सेहत का रखे, पुत्र हमेशा ध्यान। आभार डॉ. माधुरी जायसवाल ने जताया। इस दौरान राजकुमार, आकांक्षा, कियांश और प्रिंस जायसवाल सहित अन्य काव्यप्रेमी उपस्थित रहे।




