अंबिकापुर।। खबरी गुल्लक ।।
बलरामपुर के दूरस्थ जनजातीय क्षेत्र से गंभीर हालत में रेफर हुए पंडो जनजाति के मात्र 2 वर्षीय बालक को राजमाता श्रीमती देवेन्द्र कुमारी सिंहदेव शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध जिला चिकित्सालय की तत्परता से नया जीवन मिल गया। नाक- कान- गला रोग विभाग के प्राध्यापक डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता के नेतृत्व में बनी विशेषज्ञ चिकित्सक टीम ने वेंटिलेटर सपोर्ट और गहन निगरानी से इस मरणासन्न बच्चे को सफलतापूर्वक स्वस्थ कर डिस्चार्ज कर दिया। डॉ. गुप्ता ने इसे जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी का प्रतीक बताते हुए अभिभावकों को छोटे बच्चों को साबुत चना, मूंगफली जैसे खाद्य पदार्थ न देने की सलाह दी है।
दूरस्थ इलाके से रेफरल, तत्काल जीवन रक्षा
बलरामपुर जिले के एक दुर्गम क्षेत्र में रहने वाले पंडो जनजाति के इस 2 वर्षीय बालक ने चना खाते समय अचानक तेज खांसी और उल्टी के बाद अचेत हो गया। उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि मरणासन्न हो चुकी थी। जिला चिकित्सालय में प्राथमिक उपचार के बाद उसे तुरंत अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। अस्पताल पहुंचते ही एनेस्थीसिया विभाग ने एयरवे मैनेजमेंट कर बालक को वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया। सिविल सर्जन डॉ. जेके रेलवानी ने ईएनटी विभाग को विशेष निगरानी के निर्देश दिए।
डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता की अगुआई में टीम का कमाल
ईएनटी विभाग के प्राध्यापक डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता ने सहायक प्राध्यापक डॉ. उषा आर्मो, डॉ. राकेश निगम (एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष) के साथ मिलकर वेंटिलेटरी उपचार और जीवन रक्षा सुनिश्चित की। शिशु रोग विभाग के प्रमुख डॉ. केआर टेकाम और डॉ. सुमन ने गहन चिकित्सा प्रदान की। रेडियोलॉजिस्ट डॉ. सुयश के सीटी स्कैन से फेफड़े सामान्य पाए गए, जिससे उपचार की दिशा स्पष्ट हुई। लगातार तीन दिनों की निगरानी के बाद बालक वेंटिलेटर से हटाया गया और पांचवें दिन पूर्ण स्वस्थ होकर घर लौटा।
बच्चों को खाना खिलाते समय यह न करें
डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता ने बताया कि यह केस टीमवर्क और समय पर रेफरल का जीता जागता उदाहरण है। जनजातीय क्षेत्रों में ऐसी सुविधाएं पहुंचाने से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को साबुत चना, मूंगफली, अंगूर, टॉफी या छोटे दानेदार भोजन बिल्कुल न दें। इन्हें पीसकर या मैश करके ही दें। खेलते- दौड़ते या रोते समय भोजन न कराएं, हमेशा निगरानी में बैठाकर खिलाएं।
आपात स्थिति में तत्काल अस्पताल जरूरी
डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता ने अभिभावकों को सतर्क किया कि यदि बच्चा तेज खांसी लेने लगे, सांस फूले, आवाज न निकले या चेहरा-होंठ नीले पड़ें, तो इसे श्वास नली में अवरोध मानें। तुरंत पीठ पर हल्की थपथपाहट से अवरोध हटाने की कोशिश करें और बिना देरी नजदीकी अस्पताल पहुंचाएं। थोड़ी सी लापरवाही घातक साबित हो सकती है। मेडिकल कॉलेज में प्रतिवर्ष 10 से अधिक ऐसे बच्चे आते हैं, जिनके गले या श्वास नली में सिक्का, चना, सीटी, मूंगफली या सीताफल के बीज फंस जाते हैं। ईएनटी विभाग इन्हें निःशुल्क और सफलतापूर्वक उपचार प्रदान करता है। यह घटना न केवल मेडिकल कॉलेज की क्षमता को रेखांकित करती है, बल्कि जागरूकता की महत्ता भी।



