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मैनपाट की पहाड़ी बस्तियों में पेयजल संकट: केराजोबला के वनवासी दूषित नाला- ढोढ़ी का पानी पीने मजबूर

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अंबिकापुर। मैनपाट।। खबरी गुल्लक ।। 6 मई 2026। 

 छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के विकासखंड मैनपाट के दुर्गम पहाड़ी बस्तियों में आजादी के 78 साल बाद भी वनवासी समुदाय स्वच्छ पेयजल जैसे बुनियादी सुविधा  के लिए तरस रहा है। खबरी गुल्लक के मैनपाट संवाददाता महेश यादव ने इन क्षेत्रों का दौरा कर ग्राउंड जीरो रिपोर्टिंग करते हुए ग्रामीणों से उनका हाल जाना। महेश यादव ने बताया कि सपनादर ग्राम पंचायत के अंतर्गत केराजोबला बस्ती के 30-35 कोरवा और मांझी परिवार दूषित नालों व ढोढ़ी के प्रदूषित जल पर निर्भर हैं। गर्मी के इस मौसम में जलस्तर गिरने से ये स्रोत सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को 1.5 किमी दूर नाले किनारे गड्ढे खोदकर पानी जुटाना पड़ रहा है। महिलाएं- पुरुष चिलचिलाती धूप और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर लहूलुहान होकर पानी भरने को विवश हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को बार- बार अवगत कराने के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है।

 हैंडपंप तक नहीं

केराजोबला बस्ती मैनपाट  पर बसी है। यहां के वनवासी मुख्यतः कोरवा जनजाति से हैं, जो पारंपरिक रूप से जंगलों पर निर्भर रहते आए हैं। बस्ती में करीब 35 परिवार निवासरत हैं, लेकिन पेयजल के लिए कोई सरकारी सुविधा उपलब्ध नहीं। ग्रामीणों का कहना है कि दशकों से हैंडपंप या कुआं खनन का वादा सुनते आ रहे हैं, मगर जमीन पर कुछ नहीं हुआ। हम दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। गर्मियों में नाले सूख जाते हैं, तब ग्रामीण नाले किनारे 4-5 फीट गहरे गड्ढे खोदते हैं, जहां रिसाव से थोड़ा पानी जमा होता है। यह पानी पेयजल से लेकर नहाने-धोने तक सभी कामों में इस्तेमाल होता है।

सुबह 4 बजे से मशक्कत

दूरी की मार सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ रही है। केराजोबला से नाला तक का फासला लगभग डेढ़ किलोमीटर है। ऊबड़- खाबड़ पहाड़ी रास्ते पर बड़े-बड़े पत्थरों के बीच गुजरना पड़ता है। पानी के घड़े सरकते हैं, हाथ-पैर कट जाते हैं। कई बार गिर पड़ते हैं। कहती हैं बस्ती की एक अन्य निवासी सुनीता मांझी। पुरुष भी खेतों या जंगल से लौटकर इस जद्दोजहद में जुट जाते हैं। बच्चों को स्कूल भेजने से पहले सुबह 4 बजे से पानी भरने का काम शुरू हो जाता है।

 सरकारी योजनाओं का आधा-अधूरा 

हाल ही में प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत सपनादर पंचायत में सड़क निर्माण हुआ, जिससे बस्ती तक पहुंच आसान हुई। लेकिन पेयजल सुविधा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ग्रामीणों ने बताया कि जिला प्रशासन, विधायक प्रतिनिधि व पंचायत सदस्यों को कई बार ज्ञापन सौंपे, लेकिन कार्रवाई शून्य। सड़क बन गई, लेकिन पानी नहीं। अब तो मानसून आने वाला है, तब परेशानी और बढ़ जाएगी । मैनपाट क्षेत्र में कई बस्तियों में पाइपलाइन और टंकी लगाया गया मगर टंकी में एक बंद भी पानी नहीं है। आधी अधूरी कार्य से लोगों को शासकीय योजना का लाभ नहीं मिला। सरगुजा जिले में 100 से अधिक  आदिवासी बस्तियां हैं, जहां पेयजल संकट गहराया हुआ है।

 जनजातीय क्षेत्रों में पेयजल की किल्लत

मैनपाट केवल एक उदाहरण है। सरगुजा,  कोरिया व जशपुर जैसे जनजातीय जिलों की सैकड़ों पहाड़ी टोलों में यही हाल है। कोरवा, पहाड़ी कोरवा व मांझी जैसी विशेष पिछड़ी जनजातियां सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। गर्मी में जलस्रोत सूखने से डायरिया, पीलिया जैसी बीमारियां फैलती हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ के 20 प्रतिशत ग्रामीण इलाके अभी भी असुरक्षित जल पर निर्भर हैं। राज्य सरकार की जल जीवन मिशन योजना के तहत 2024 तक हर घर नल-जल का लक्ष्य था, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में केवल 30 से 35 प्रतिशत क्षेत्र में लक्ष्य हासिल हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि भौगोलिक चुनौतियां व भ्रष्टाचार इसके पीछे मुख्य कारण हैं।


 

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