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नल-जल योजना का काला चिट्ठा.. कागजों में बहा पानी, जमीन पर सूखे नल, मैनपाट में ग्रामीण पी रहे नाला का दूषित जल

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अंबिकापुर/ मैनपाट।। खबरी गुल्लक।।

सरगुजा जिले के ऊंचे पठारी इलाके मैनपाट में हर घर जल की चमकती योजनाओं का सच जमीन पर धुंधला पड़ गया है। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना के नाम पर लाखों-करोड़ों की सरकारी राशि का जमकर बंदरबांट हुआ। कागजों में हर घर तक कनेक्शन दिखाए गए, लेकिन हकीकत में ग्रामीण आज भी हैंडपंप, नाले और दूरस्थ झरनों पर आश्रित हैं। अधूरी पाइपलाइन, खाली टंकियां और जियो-टैगिंग में हेराफेरी के आरोपों ने योजना की पोल खोल दी है। ग्रामीणों ने सरपंच के नेतृत्व में प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर भौतिक सत्यापन, ऑडिट और तत्काल कार्रवाई की मांग की है। मैनपाट छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ठंडी वादियों के लिए जाना जाता है। सरगुजा जिले का यह क्षेत्र जनजातीय बहुल है, जहाँ कई गांव पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं, जहां पानी की समस्या पुरानी है। 2019 में शुरू हुई जल जीवन मिशन (जेएलएम) योजना के तहत मैनपाट विकासखंड में  करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा किया गया। योजना का लक्ष्य  हर घर में नल से स्वच्छ पानी पहुंचाना था। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदारों और अधिकारियों की सांठगांठ से काम कागजों तक सीमित रह गया।

ग्राम सपनादर  के रहने वाले खबरी गुल्लक के मैनपाट संवाददाता  महेश यादव बताते हैं कि हमारे गांव में नल-जल योजना के तहत लोहे का ऊंचा टावर बनाया गया और उस पर टंकी रख दी। लेकिन न पाइपलाइन बिछी, न पानी का इंतजाम। अब टंकी खाली पड़ी सड़ रही है। हम लोग 2-3 किलोमीटर दूर नाले का गंदा पानी लाते हैं। गर्मी के दिनों में तो हालत खराब हो जाती है। अन्य ग्रामीणों की यही कहानी है। जियो-टैगिंग रिपोर्ट्स में फर्जी फोटो अपलोड कर काम पूरा दिखाया गया। एक अन्य ग्रामीण, जानकी बाई कहती हैं कि कई जगह पाइपलाइन बीच में ही छोड़ दी गई। टैंक बनाए गए, लेकिन पंप न चलने से सप्लाई रुकी हुई है। भुगतान पहले ही हो चुका है।

प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग के अधिकारियों पर ठेकेदारों से मिलीभगत का आरोप है। सूत्रों के मुताबिक, मैनपाट ब्लॉक में 95 प्रतिशत कनेक्शन पूरे हो चुके हैं, लेकिन जमीन पर केवल 5 से 10  प्रतिशत ही कार्यान्वित दिखता है। जियो-टैगिंग ऐप के जरिए फोटो अपलोड करने में हेराफेरी सामने आई है। कई जगह पुरानी या फर्जी तस्वीरें इस्तेमाल की गईं। एक पूर्व सरपंच ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ठेकेदारों ने कम गुणवत्ता का माल लगाया। पाइप फट जाते हैं, जोड़ ढीले पड़ जाते हैं। शिकायत करने पर सुनवाई नहीं। बगैर जल स्त्रोत टंकी लगा दिया गया ।  गांवों में योजना के तहत 2000 से अधिक कनेक्शन देने का लक्ष्य था। लेकिन ग्रामीणों के अनुसार, 60 प्रतिशत घरों तक पानी नहीं पहुंचा।  महिला सरपंच  के नेतृत्व में 200 से अधिक ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई है कि सभी गांवों में स्वतंत्र एजेंसी से भौतिक सत्यापन कराया जाए,  ठेकेदारों और अधिकारियों के भुगतान की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, अधूरे कनेक्शन वाले घरों में तुरंत जलापूर्ति शुरू हो, दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हो, महिला सरपंच  ने कहा शासन ने पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन विभाग की लापरवाही से योजना दम तोड़ रही है। इस सीजन में भी समस्या बरकरार रहेगी। हम आंदोलन को तेज करेंगे। 

यह मुद्दा सिर्फ मैनपाट तक सीमित नहीं। छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन पर अरबों खर्च हो चुके हैं।  कई जगह फंड मिसयूज के आरोप लगे हैं। सरगुजा जिले में ही 20 से अधिक योजनाओं पर सवाल उठे हैं। जियो-टैगिंग में पारदर्शिता की कमी है। सैटेलाइट इमेज से सत्यापन जरूरी है।विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कुछ तकनीकी खराबियां हैं, जिन्हें ठीक किया जा रहा है। लेकिन ग्रामीणों का भरोसा टूट चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि योजना की सफलता के लिए स्थानीय भागीदारी, नियमित मॉनिटरिंग और सख्त कार्रवाई जरूरी है।

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