साहित्य का भारतेन्दु काल गद्य की कई विद्याओं के विकास का साक्षी रहा है- वीरेंद्र श्रीवास्तव, भारतेन्दु हरिशचन्द्र जयंती पर भारतेन्दु साहित्य-कला समिति का वार्षिकोत्सव

साहित्य का भारतेन्दु काल गद्य की कई विद्याओं के विकास का साक्षी रहा है- वीरेंद्र श्रीवास्तव, भारतेन्दु हरिशचन्द्र जयंती पर भारतेन्दु साहित्य-कला समिति का वार्षिकोत्सव

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अंबिकापुर।खबरी गुल्लक 

भारतेन्दु हरिशचन्द्र जयंती के अवसर पर भारतेन्दु साहित्य-कला समिति का वार्षिकोत्सव एवं भारतेन्दु जी की जयंती कार्यक्रम बड़े ही हर्षो-उल्लास से सहित्यिकी, गीत-संगीत, नृत्य, विचार गोष्ठी एवं समिति संस्था द्वारा स्थापित सम्मान समारोह, पुस्तक विमोचन के साथ सम्पन्न हुआ। स्टेडियम प्रांगण में अवस्थित भारतेन्दु साहित्य-कला भवन में कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम अतिथियों एवं संस्था की अध्यक्ष श्रीमति नीलिमा मिश्र द्वारा माता सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर भारतेन्दु जी एवं संस्था के संस्थापक स्व. पं. जीवन नाथ मिश्र जी के छाया चित्र पर माल्यार्पण कर प्रारम्भ किया गया। तत्पष्चात् कार्यक्रम में मनेन्द्रगढ़ से पधारे मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार विरेन्द्र श्रीवास्तव, विषिष्ठ अतिथि डाॅ. सुदामा मिश्र, राजेष मिश्र कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे  साहित्यकार  बबन पाण्डेय, कार्यक्रम की संचालिका डाॅ. संध्या सिंह को गुलदस्ता, फुल माला से स्वागत किया गया। विचार गोष्ठी में मनेन्द्रगढ़ से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार विरेन्द्र श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य का भारतेन्दु काल गद्य की कई विद्याओं के विकास का साक्षी रहा है। आज हिन्दी जब भारतीय बाजार की भाषा बन चुकी है ऐसे समय में हिन्दी का प्रभाव देष की बड़ी जनसंख्या के द्वारा बोली जाने वाली भाषा के साथ-साथ विदेषों में भी कई देषों में बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। ऐसे समय में भारतेन्दु हरिषचन्द्र के योगदान को हिन्दी के उत्थान के मील का पत्थर कहा जाये तो अतिष्योक्ति नहीं होगी।”कार्यक्रम के विषिष्ट अतिथि डाॅ. सुदामा मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा-“नवजागरण के पुरोधा, राष्ट्रीय चेतना के संवाहक, राष्ट्र प्रेमी भारतेन्दु हरिषचन्द्र का व्यक्तित्व बहु आयामी था। बलिया एव प्रयाग में दिया गया व्याख्यान उनके भाषा के प्रति लगाव एवं देष भक्ति का परिचय देता है।विषिष्ट अतिथि राजेश मिश्रा ने अपने भाषोद्गार कुछ इस प्रकार से व्यक्त किया यदि यह माने कि आधुनिक युग की शुरूआत 19वीं सदी में हुई तो फिर यह भी सहजता से स्वीकारना होगा कि आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिशचन्द्र हैं।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री बबन जी पाण्डेय ने कहा कि भारतेन्दु हिन्दी साहित्य युग प्रवर्तक के रूप में जाने जाते हैं। हिन्दी साहित्य की भाषा को संस्कृत और उर्दु की से मुक्त करते, हिन्दी को बोल-चाल में स्थापित किया गया। इन्होंने भारतीय संस्कृति की महिमा का बखान करते हुए तत्कालिन सामाजिक रूढ़ियों से मुक्त करने का संदेष दिया।अतिथियों के उद्बोधन के पश्चात् संस्था के संरक्षक-संयोजक द्वितेन्द्र मिश्र ने साहित्य एवं साहित्यकारों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि यही एक वर्ग है जो समाज के दर्पण की भूमिका अदा करते हुए सत्ता से सवाल करता है। हर परिस्थिति में तटस्थ रह कर समाज को राह दिखाने का काम करता है। साथ ही उन्होंने इस अवसर पर संस्था के संस्थापक दिवंगत पूर्व अघ्यक्ष स्व. श्री जीवन नाथ मिश्र  स्मृति पुरस्कार 2026 के लिए संस्था की चयन समिति द्वारा चयनित सरगुजा की प्रख्यात समाज सेविका सुश्री वंदना दत्ता के नाम की घोषणा करते हुए उन्हेें बड़े सम्मान व आदर भाव से मंच पर आमंत्रित किया। जहाँ समस्त अतिथियों द्वारा सुश्री वंदना दत्ता जी को शाॅल-श्री फल-प्रषस्ति पत्र मोमेंटम के रूप में एवं नगद राषि ग्यारह हजार पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर संस्था की अध्यक्ष श्रीमती नीलिमा मिश्रा ने सुश्री वंदना दत्ता के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाष डालते हुए समाज में उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों का उल्लेख किया तथा उन्हें समाज की धरोहर निरूपित किया। एवं उनके स्वास्थ्य की मंगल कामना किया। गीत-संगीत, समाज सेवा जैसे बहुआयामि प्रतिभा की धनी सुश्री वंदना दत्ता को शाल, श्रीफल, गुलदस्ता प्रमाण-पत्र के साथ ही नगद ग्यारह हजार प्रदान कर “पं.जीवन नाथ मिश्र सम्मान” से सम्मानित किया गया। सम्मान पश्चात् सुश्री वंदना दत्ता जी ने संस्था का आभार प्रकट करते हुए इसे सभी के सहयोग का परिणाम बताया। कार्यक्रम के द्वितीय चरण में स्थानिय संगीत विद्यालय के छात्र-छात्राओं के द्वारा  षिक्षक डाॅ. मानक टंडन के मार्ग दर्षन में संगीतमय लोकगीत, भजन इत्यादि की प्रस्तुती दी गई। साथ तीजन बाई के समान एक छात्रा द्वारा महाभारत के एक अंष की प्रस्तुती दी गई। इसके अतिरिक्त प्रेमानंद पातर जी के द्वारा भी भजन व गीत प्रस्तुत किया गया। गोधनपुर के रवि पाण्डेय जी ने भी गजलों की शानदार प्रस्तुती से दर्षक दीर्घा का मन मोह लिया। कार्यक्रम का कुषल संचालन श्रीमती संध्या सिंह जी ने एवं आभार कार्यक्रम समिति से सचिव डाॅ. सुधीर पाठक ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में सुधीजन व साहित्यकारों की उपस्थिति उल्लेखनिय रही। कुछ प्रमुख नाम हैं- डाॅ. पुष्पा सिंह, एम.एम. मेहता, हरिकिषन शर्मा, आर.डी. मिश्र, कन्हैया लाल गौड़, राम लोलार्क मिश्र, डाॅ. राम कुमार मिश्र, देवेन्द्र दुबे, प्रभुनारायण वर्मा, वेद प्रकाष अग्रवाल, राजेष पाण्डेय, राजेष तिवारी, दुर्गा प्रसाद तिवारी, सच्चिदानंद पाण्डेय, रमेष सिन्हा, दुर्गेष द्विवेदी, संतोष कुमार, योगेष गुप्ता, नरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, आर.एच.श्रीवास्तव, जय प्रकाष चैबे, प्रताप पाण्डेय, देव चरण गुप्ता, अजित त्रिपाठी, जमगला से षिवब्रत पावले एवं अषोक जमगलिहा, राम नारायण सिंह, श्रीमती गूंजर मिंज, ओम प्रकाष तिवारी, जय गुप्ता, राकेष मिश्रा, राज नारायण द्विवेदी, मंगल पाण्डेय, अभय तिवारी, श्रीमती गीता दुबे, डाॅ. षलभ दुबे “वीणा”, पुनम शुक्ला, राज लक्ष्मी पाण्डेय, माधुरी जायसवाल, शीरिल खान, अंजू पाण्डेय, नीतू मिश्रा, उपमा पाण्डेय, ममता मिश्रा, दीप मिश्रा, अंकित मिश्रा, विमला देवी, श्रीमती रूबी सिद्धीकी सहित अन्यान्न गणमान्य साहित्य व कला प्रेमी जन उपस्थित थे। कार्यक्रम का समापन सामुहिक प्रीति भोज एवं शुभकामनाओं के साथ हुआ।

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