शावकों के कारण उत्पाती हाथी नहीं छोड़ रहे क्षेत्र, धान के खेतों में मचा रहे तबाही, वन अमला 'गायब', मोबाइल बंद कर जिम्मेदारी से भाग रहे अधिकारी

शावकों के कारण उत्पाती हाथी नहीं छोड़ रहे क्षेत्र, धान के खेतों में मचा रहे तबाही, वन अमला 'गायब', मोबाइल बंद कर जिम्मेदारी से भाग रहे अधिकारी

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 खबरी गुल्लक न्यूज़।सूरजपुर 25 जुलाई 2025। (भूपेंद्र राजवाड़े)

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश सीमा से लगे चांदनी बिहारपुर क्षेत्र के मोहरसोप गांव में हाथियों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा। बीते एक सप्ताह से सात हाथियों का झुंड लगातार खेतों में डेरा जमाए हुए है। छोटे हाथी के जन्म के चलते ये झुंड जंगल छोड़ने को तैयार नहीं और इधर किसानों की धान की फसल उनके पैरों तले रौंद कर नष्ट होती जा रही है।


धान के खेत अब हाथियों का ‘खेल का मैदान’ बन चुके हैं, जहां वे दिनभर घूमते, खेलते और किसानों की मेहनत को तबाह करते हैं। गुरुवार सुबह भी मोहरसोप व बसनारा गांव के खेतों में यही नज़ारा देखने को मिला। फसल बर्बादी से परेशान किसानों ने किसी तरह उन्हें खदेड़ा, लेकिन डर अब भी बना हुआ है।


प्रशासन है लापता, मोबाइल बंद कर बैठे हैं जिम्मेदार

वन विभाग के रेंजर मेवालाल पटेल और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के रेंजर ललित सायं पैकरा – दोनों का मोबाइल लगातार बंद है। ग्रामीणों ने जब अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की तो कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। ऐसे वक्त में जब ग्रामीणों की जान-माल खतरे में है, जिम्मेदार अधिकारी या तो नदारद हैं या संपर्क से बाहर।


हर साल की तबाही, कोई स्थायी समाधान नहीं

बीते वर्ष भी हाथियों ने 500 एकड़ से अधिक फसल को नुकसान पहुंचाया था और एक ग्रामीण की जान भी चली गई थी। बावजूद इसके प्रशासन ने न तो स्थायी हल निकाला, न ही खेतों को सुरक्षित रखने कोई ठोस इंतजाम किया। किसानों को मुआवजा के नाम पर सिर्फ फॉर्म थमाए जा रहे हैं, पैसे अब भी बहुसंख्यकों को नहीं मिले।


ग्रामीणों में उबाल: "हाथी बचे या हम?"

मोहरसोप, कछिया, बसनारा, नवडिहा, रसोकी जैसे गांवों के किसान अब खुलकर शासन और वन विभाग के खिलाफ नाराजगी जता रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आखिर हम किससे उम्मीद करें? हमारे पास खेत बचाने का कोई साधन नहीं, हाथियों को भगाने की व्यवस्था नहीं, और अधिकारी फोन बंद कर बैठे हैं।"


क्या जान जाने के बाद ही जागेगा सिस्टम?

क्या प्रशासन किसी नई जनहानि का इंतजार कर रहा है? क्या किसानों की ज़िंदगी और जीविका दोनों को यूं ही बर्बाद होते देखना सरकार की नीति बन गई है? हाथियों को लेकर कोई पूर्व चेतावनी तंत्र, निगरानी या नियंत्रण तंत्र सक्रिय नहीं है। ग्रामीण खुद जान जोखिम में डालकर उन्हें खदेड़ने को मजबूर हैं।



यह मामला सिर्फ वन्यजीवों की उपस्थिति का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की गहरी असफलता और असंवेदनशीलता का भी है। जब जान जोखिम में हो, फसल तबाह हो रही हो और अधिकारी 'फोन बंद' कर भागे हों, तब यह लोकतंत्र नहीं – लापरवाह तंत्र बन जाता है। यदि अब भी शासन नहीं जागा तो ये हाथी खेत ही नहीं, सरकारी विश्वास को भी रौंद डालेंगे।

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