अम्बिकापुर।खबरी गुल्लक
गरीब और जरूरतमंद मरीजों को गंभीर बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू की गई आयुष्मान भारत जैसी महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजनाएं अब सरगुजा में गंभीर सवालों के घेरे में हैं। जिस योजना को गरीब मरीज की ढाल बनना था, उसी के नाम पर करोड़ों रुपये के भुगतान, प्रोत्साहन राशि के वितरण, पात्रता और निजी अस्पतालों के क्लेम को लेकर उठ रहे सवालों ने व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक ओर शासकीय चिकित्सा संस्थान के अधिकारी-कर्मचारी वर्ष 2020 से प्रोत्साहन राशि नहीं मिलने की शिकायत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आरोप है कि योजना से जुड़े भुगतान में पात्र और अपात्र का फर्क तक धुंधला हो गया। सवाल इसलिए और गंभीर है क्योंकि मामला हजारों या लाखों का नहीं, करोड़ों रुपये के सरकारी धन से जुड़ा है। आखिर गरीब मरीज के नाम पर स्वीकृत धन का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। मरीज को या योजना के इर्द-गिर्द खड़े हो चुके व्यावसायिक और प्रशासनिक तंत्र को?
मरीज के इलाज की योजना या अस्पतालों का कारोबार?
शहर के कुछ निजी अस्पतालों द्वारा आयुष्मान/RSBY के माध्यम से बड़े पैमाने पर उपचार और क्लेम किए जाने को लेकर लंबे समय से चर्चाएं और शिकायतें सामने आती रही हैं। यदि किसी अस्पताल के विरुद्ध अनियमितता से संबंधित दस्तावेज अथवा शिकायतें प्रशासन तक पहुंची हैं, तो जनता यह जानने की हकदार है कि उन शिकायतों पर आखिर क्या कार्रवाई हुई?
शासकीय भवन के दीवार पर प्रचार
शहर की दीवारों और सार्वजनिक स्थानों पर अस्पतालों के विज्ञापनों की भरमार दिखाई देती है। पार्किंग, निर्धारित अधोसंरचना से जुड़े नियमों के अनुपालन को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद यदि नियमों के उल्लंघन की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती, तो स्थानीय नियामक व्यवस्था पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
हर बार कार्रवाई स्टेट से होगी तो स्थानीय अधिकार किसलिए
आयुष्मान संबंधी मामलों में कार्रवाई राज्य स्तर से होने की बात कहकर स्थानीय स्तर की जिम्मेदारी सीमित बताई जाती है। लेकिन अस्पताल के पंजीयन, संचालन व पालन को सुनिश्चित करने में स्थानीय सक्षम अधिकारियों की भी भूमिका है। ऐसे में सीधा सवाल है यदि स्थानीय प्रशासन के सामने नियमों के उल्लंघन के प्रमाण उपलब्ध हैं, तो अपने अधिकार क्षेत्र में कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। राज्य स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित है तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मामला कब और किस स्तर पर भेजा गया तथा वहां से अब तक क्या कार्रवाई हुई।
सबसे बड़ा सवाल मेडिकल कॉलेज पर
पूरे प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला पहलू शासकीय मेडिकल कॉलेज एवं संबद्ध चिकित्सालय से जुड़ा है। यह संस्थान स्वयं योजना के अंतर्गत बड़ी मात्रा में उपचार और क्लेम करने वाला शासकीय संस्थान रहा है। समाचारों में स्वास्थ्य अधिकारी-कर्मचारियों द्वारा वर्ष 2020 से प्रोत्साहन राशि नहीं मिलने और प्रोत्साहन राशि के वितरण में करोड़ों रुपये की आर्थिक गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं। शिकायत यह भी है कि जिन्हें राशि मिलनी चाहिए थी वे इंतजार करते रहे, जबकि अन्य व्यक्तियों को लाभ पहुंचाए जाने के आरोप लगे।यदि ये आरोप अभिलेखों से पुष्ट होते हैं तो मामला केवल प्रोत्साहन राशि न मिलने का नहीं रह जाता, बल्कि यह सरकारी धन के वितरण और संस्थागत जवाबदेही का गंभीर प्रश्न बन जाता है।
पोर्टल बोल रहा है, फिर लाचारगी क्यों
इस प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संचालित होती है। किसके नाम राशि दर्ज हुई, कितना भुगतान हुआ और उससे संबंधित रिकॉर्ड क्या है, इनका महत्वपूर्ण हिस्सा पोर्टल एवं वित्तीय अभिलेखों में मौजूद होना चाहिए। फिर सवाल है जब पोर्टल बोल रहा है, डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद है, तो कार्रवाई मौन क्यों है।
तो निष्क्रियता का कारण हो सार्वजनिक
मामला केवल किसी एक डेटा एंट्री कर्मचारी तक सीमित करके भी समाप्त नहीं किया जा सकता। डेटा एंट्री करने वाला कोई कर्मचारी अपने स्तर पर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि का वितरण नहीं कर सकता। इसलिए पूरे मामले में नामवार जवाबदेही तय होना आवश्यक है। और यदि कलेक्टर दर अथवा संविदा पर कार्यरत किसी कर्मचारी से जुड़े लाखों रुपये के संदिग्ध भुगतान या अन्य गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के प्रमाण प्रशासन के सामने हैं, तो यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि उसके विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई की गई। यदि FIR नहीं हुई, वसूली नहीं हुई अथवा संबंधित व्यक्ति को संवेदनशील कार्य से पृथक तक नहीं किया गया, तो इस निष्क्रियता का कारण भी सार्वजनिक होना चाहिए।
दावा जांच जारी है, सवाल आखिर कब तक
करोड़ों रुपये के मामले में बार-बार “जांच जारी है” कहकर प्रकरण को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना समाधान नहीं हो सकता। जब भुगतान एवं लाभार्थियों से संबंधित डिजिटल और वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध हों, तब आवश्यकता जांच को अंतहीन खींचने की नहीं बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नामवार जिम्मेदारी तय करने और निर्णय लेने की है। जहां अनियमित भुगतान स्थापित हो वहां नियमानुसार वसूली और विभागीय कार्रवाई हो तथा जहां उपलब्ध साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया आपराधिक कृत्य सामने आए, वहां FIR सहित वैधानिक कार्रवाई से भी परहेज नहीं होना चाहिए। करोड़ों के सरकारी धन का मामला है। जवाबदेही तय होनी चाहिए और कार्रवाई जमीन पर दिखाई देनी चाहिए। भाजपा शासन के सामने बड़ा सवाल गरीब के हक की योजना पर किसका नियंत्रण।
सरकार के समक्ष चुनौती यह भी..
वर्तमान भाजपा सरकार के सामने चुनौती अब केवल आयुष्मान योजना को संचालित करने की नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम करने की भी है कि गरीब मरीज के नाम पर स्वीकृत सरकारी धन के दुरुपयोग का दोषी पाया जाने वाला कोई व्यक्ति या संस्था प्रभाव, पद अथवा पहुंच के कारण कार्रवाई से नहीं बच सकेगा। निजी अस्पताल हो या सरकारी मेडिकल कॉलेज नियम और जवाबदेही दोनों के लिए समान होने चाहिए। यदि दस्तावेज, शिकायतें और डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बाद भी निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तो जनता में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आयुष्मान की अनियमितताओं पर अंकुश लगाने वाला तंत्र आखिर इतना बेबस क्यों दिखाई दे रहा है?
जनता के पांच सवाल, जवाब कौन देगा?
करोड़ों रुपये का पूरा हिसाब कहां है? पात्र अधिकारी-कर्मचारियों की प्रोत्साहन राशि वर्षों तक क्यों रुकी? यदि अपात्र लोगों को भुगतान हुआ तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? शिकायतों के बावजूद संबंधित अस्पतालों पर क्या कदम उठाए गए? और सबसे बड़ा सवाल यदि प्रमाण सामने हैं तो दोषियों पर कार्रवाई में आखिर बाधा क्या है?इन सवालों के जवाब नई समितियों और लंबी जांचों में नहीं, बल्कि रिकॉर्ड आधारित जवाबदेही, अनियमित राशि की वसूली और दोष स्थापित होने पर ठोस विभागीय एवं वैधानिक कार्रवाई में हैं। आयुष्मान गरीब मरीज के हक की योजना है। इसे किसी अस्पताल, अधिकारी, कर्मचारी या बिचौलिए की कमाई का माध्यम बनने देना केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि योजना के मूल उद्देश्य पर कुठाराघात है। पोर्टल पर रिकॉर्ड, सामने शिकायतें, फिर भी कार्रवाई का इंतजार क्यों। यही सवाल अब सरगुजा की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासन, दोनों से जवाब मांग रहा है।




