अंबिकापुर। खबरी गुल्लक। 22 सितम्बर 2026
अफ्रीकन स्वाइन फीवर जैसी घातक बीमारी से सुकरों की सुरक्षा की दिशा में बड़ी उपलब्धि सामने आई है। अंबिकापुर के समीप ग्राम सकालो स्थित शासकीय सुकर फार्म में देश की पहली स्वदेशी अफ्रीकन स्वाइन फीवर वैक्सीन का परीक्षण सफल रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद आईसीएआर के राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान, भोपाल के वैज्ञानिकों ने परीक्षण के निष्कर्षों की जानकारी संभागायुक्त नरेंद्र दुग्गा को दी। वैक्सीन को 16 जुलाई 2026 को आईसीएआर के 98वें स्थापना दिवस के अवसर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्र को समर्पित किया। वैज्ञानिकों के अनुसार वैक्सीन के व्यावसायिक उत्पादन, पेटेंट और निर्माण प्रक्रिया पूरी होने के बाद आगामी छह माह से एक वर्ष के भीतर इसके बाजार में उपलब्ध होने की संभावना है। आईसीएआर-एनआईएचएसएडी, भोपाल ने देश की पहली स्वदेशी लाइव-एटेन्यूएटेड अफ्रीकन स्वाइन फीवर वैक्सीन विकसित की है। सकालो स्थित सुकर फार्म में मार्च 2026 से वैक्सीन का फील्ड ट्रायल चल रहा था। परीक्षण के लिए विभिन्न प्रजातियों और आयु वर्ग के 50 स्वस्थ सुकरों का चयन किया गया। हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज लैब, भोपाल के वैज्ञानिकों ने इन सुकरों के रक्त के नमूने लेकर कई चरणों में जांच की। परीक्षण के दौरान वैक्सीन की सुरक्षा, प्रभावशीलता और सुकरों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की क्षमता का वैज्ञानिक परीक्षण किया गया। जांच में वैक्सीन लगाए गए सुकरों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने तथा अफ्रीकन स्वाइन फीवर के संक्रमण की आशंका कम होने के संकेत मिले। वैज्ञानिकों ने बताया कि वैक्सीन के प्रयोग से सुकर पालकों को बीमारी से होने वाली आर्थिक क्षति को कम करने में मदद मिलेगी। एशिया की प्रतिष्ठित आईसीएआर-एनआईएचएसएडी, भोपाल की टीम में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सेंथिल और डॉ. फतेह के साथ स्थानीय पशु चिकित्सक डॉ. सीके मिश्रा तथा डॉ. अजय अग्रवाल ने भी परीक्षण में सहयोग किया। वैज्ञानिकों ने संभागायुक्त से सौजन्य भेंट कर परीक्षण की प्रक्रिया और सफलता के संबंध में विस्तार से जानकारी दी।
छत्तीसगढ़ में 250 से अधिक सुकरों की हुई थी मौत
पशु चिकित्सकों के अनुसार अफ्रीकन स्वाइन फीवर के संक्रमण के कारण छत्तीसगढ़ में सुकर पालन से जुड़े किसानों को पहले भारी नुकसान उठाना पड़ा है। संक्रमण के दौरान बलौदाबाजार स्थित सुकर फार्म के करीब 100 तथा दुर्ग स्थित सुकर फार्म के लगभग 150 सुकरों को प्रोटोकॉल के तहत मारना पड़ा था। चिकित्सकों ने बताया कि अफ्रीकन स्वाइन फीवर का संक्रमण मिलने पर शासन की गाइडलाइन के अनुसार संक्रमित क्षेत्र के आसपास के सुकरों को भी नियंत्रित करना पड़ता है। कई मामलों में संक्रमण के केंद्र से एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले सुकरों को मारने की कार्रवाई की जाती है। अब स्वदेशी वैक्सीन उपलब्ध होने से बीमारी की रोकथाम और सुकर पालकों की आजीविका बचाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
क्या है अफ्रीकन स्वाइन फीवर
डॉ. सीके मिश्रा ने बताया कि अफ्रीकन स्वाइन फीवर एक अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है, जो घरेलू और जंगली दोनों प्रकार के सुकरों को प्रभावित करती है। यह बीमारी मनुष्यों में नहीं फैलती और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं मानी जाती, लेकिन सुकरों में इसकी मृत्यु दर बहुत अधिक हो सकती है। इसके प्रमुख लक्षणों में 40 से 42 डिग्री सेल्सियस तक तेज बुखार, भूख न लगना, सुस्ती, उल्टी, दस्त, सांस लेने में कठिनाई, कमजोरी तथा कान, पेट और पैरों पर लाल या नीले-बैंगनी रंग के धब्बे शामिल हैं। संक्रमित सुकरों के सीधे संपर्क, दूषित चारा-पानी, उपकरणों और वाहनों के माध्यम से यह बीमारी तेजी से फैल सकती है।
वैक्सीन से सुकर पालकों को राहत की उम्मीद
आईसीएआर द्वारा विकसित वैक्सीन भारतीय परिस्थितियों और यहां पाए जाने वाले वायरस के आधार पर तैयार की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह एमए-104 सेल लाइन पर आधारित लाइव-एटेन्यूएटेड वैक्सीन है। इसे स्वस्थ आठ सप्ताह से अधिक उम्र के सुकरों में लगाने की सिफारिश की गई है; प्रारंभिक खुराक के बाद 14 दिन में बूस्टर डोज देने का प्रावधान बताया गया है। हालांकि, व्यावसायिक उपलब्धता के बाद वैक्सीन का उपयोग पशुपालन विभाग और अधिकृत पशु चिकित्सकों की सलाह के अनुसार ही किया जाना होगा। वैक्सीन के बाजार में आने से सुकरों को अफ्रीकन स्वाइन फीवर से बचाने, किसानों की आर्थिक क्षति कम करने और देश में पशु रोग नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण मदद मिलने की उम्मीद है।




