कटुता है जिन रिश्तों में, मोदक-सी मिठास भरें, विघ्नहर्ता विघ्न हरेंगे, जीवन में विश्वास करें: डॉ पुष्पा सिंह! गणेशोत्सव पर हुआ सरस कवि-सम्मेलन का आयोजन

कटुता है जिन रिश्तों में, मोदक-सी मिठास भरें, विघ्नहर्ता विघ्न हरेंगे, जीवन में विश्वास करें: डॉ पुष्पा सिंह! गणेशोत्सव पर हुआ सरस कवि-सम्मेलन का आयोजन

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अंबिकापुर। खबरी गुल्लक। 

गणेशोत्सव पर होटल मानस पैलेस में वरिष्ठ कवयित्री डॉ. पुष्पा सिंह के संयोजन में सरस कवि-सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस दौरान कवियों ने भगवान् गणपति, शिव और सरस्वती की वंदना के साथ देशभक्ति, प्रेम, श्रृंगार, प्रकृति चित्रण तथा जीवन और जगत् की विविध समस्याओं व मानवीय व्यवहार पर अपनी उत्कृष्ट रचनाओं की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का संचालन कवि राजेश पांडेय ने किया ।कार्यक्रम का शुभारंभ गीतकार कृष्णकांत पाठक द्वारा प्रस्तुत मनोहारी सरस्वती-वंदना से हुआ। कवि प्रकाश कश्यप ने भगवान् एकदंत को आनंद, मंगल व बुद्धि का प्रदाता बताते हुए कहा- गजानन आनंद के दाता। विघ्न विनाशक, मंगल दायक, बुद्धि प्रदाता, जग प्रतिपालक। जो भी आया शरण तिहारे, सुख जग का वह पाता। चर्चित दोहाकार व शायर मुकुंदलाल साहू ने गणेश जी पर अनेक दोहे सुनाए तथा श्रीगणेश के आगमन से संपूर्ण परिवेश के शुद्धिकरण, सौंदर्यीकरण व मनभावन होने की बात कही- सब तेरा वंदन करें, मंगलमूर्ति गणेश। तेरे आने से हुआ, मंगलमय परिवेश। विघ्नहरण, मंगल करण, विद्या बुद्धि निधान। जन-जन के सब दुख हरो, लंबोदर भगवान्। शुभ कामों में ही नहीं हो गणेश का ध्यान। याद उन्हें करते रहें, दें उनको सम्मान। गीतकवि कृष्णकांत पाठक ने गणेश-भक्ति पर सुंदर गीत सुनाकर सबको भाव-विभोर कर दिया- भगवान् तेरे दर से मैं खाली तो न जाऊंगा, विश्वास है इतना कि सवाली तो न जाऊंगा। माना कि तेरे पथ पर मैं दौड़ नहीं सकता, पर राह भी मैं तेरी तो छोड़ नहीं सकता। गम हो खुशी, सभी में मैं तो मुस्कुराऊंगा। डॉ. पुष्पा सिंह ने अपनी कविता में भगवान् गणनाथ पर भरोसा करके, आपसी घृणा-द्वेष को भुलाकर प्रेममय जीवन बिताने का आग्रह किया- कटुता है जिन रिश्तों में, मोदक सी मिठास भरें। विघ्नहर्ता विघ्न हरेंगे, जीवन में विश्वास करें। दैत्यों का हो सर्वनाश, देवों का दिव्य वेश धरें। घृणा-द्वेष को भूलें हम, प्रेम का श्रीगणेश करें। जाने-माने गज़लकार देववंश दुबे ने अपने दोहों में गणाधिप से बिगड़े काम बनाने की अपील की- प्रथम पूज्य, मोदक प्रिये, हे गणपति महाराज। बिगड़े काम बनाइए, मंगल करिए काज। गणनायक प्रभु आप हैं, विघ्नविनायक आप। अंदर की विपदा हरें, बाहर का संताप। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर ने प्रथम पूज्य, विघ्न विनाशक भगवान् गणेश्वर को सबके प्राणों का रक्षक बताया- शंकर सुवन सुरपति, प्रथम पूज्य गणेश। शरण मूषक को दिया, दयावंत दिनेश। विद्या बुद्धि दाता, विघ्नहर्ता सुखदाता। माता-पिता भ्राता, तू ही प्राण-त्राता।    कवि-सम्मेलन में कवयित्री भावना सिंह ने भगवान् गजवदन को प्रणाम करते हुए जहां भोजपुरी गीत "काहे कइला ए बाबूजी दुरंगी नीतियां" सुनाकर पुत्र-पुत्री में अंतर संबंधी पुरानी रूढ़िवादी सोच पर करारा व्यंग्य किया, तो वहीं कविवर राजेश पांडेय ने बेटी को ही सृष्टि और संसार बताया- बेटी ही सृष्टि और संसार है, मर्म सहित व्यवहार है। इस दुनिया की अनुपम रचना, वह हम सबका श्रृंगार है। एक है बेटी, नारी सृष्टि, सब ब्रह्मांडीय उपहार है। इस दौरान कवि अजय सागर ने राष्ट्रभक्ति की सरिता प्रवाहित कर दी। उन्होंने लालकिले की मनोव्यथा का मर्मस्पर्शी चित्रण अपने काव्य में किया- लाल किला हूं बोल रहा हूं, दर्द मैं दिल का खोल रहा हूं।मैंने देखा भगत सिंह को, जो सच का मतवाला था। बापू को देखा था मैंने, जो सत्य अहिंसा वाला था। सदियों से चुप था अब बोल रहा हूं, धीरे-धीरे डोल रहा हूं। अंत में वरिष्ठ कवि श्यामबिहारी पांडेय ने अपनी अत्यंत प्रेरक व उम्दा ग़ज़ल से श्रोताओं को जहां मंत्रमुग्ध कर दिया, वहीं बहुत कुछ सोचने-विचारने को बाध्य भी किया। संतानों के लिए पूरा जीवन अर्पित कर देने के बाद भी पिता को मिली उपेक्षा और एकाकीपन का चित्रण उनकी ग़ज़ल में था ही, एक तमाशा, मदारी-सा बन जाने की हृ्दयविदारक पीड़ा भी उसमें साफ दिखाई दी- जग में तमाशा बने जा रहा हूं, बन के मदारी जिए जा रहा हूं। जिनके लिए बन गया मैं मशीनी, मैंने किया क्या, सुने जा रहा हूं। दुनिया को मेरी जरूरत नहीं है, लेकिन मैं उसपर मरे जा रहा हूं। हमको हमीं से हुई है मोहब्बत, फिकरा मैं खुद पर कसे जा रहा हूं। कार्यक्रम के अंत में डॉ. पुष्पा सिंह ने सभी का आभार जताया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार अनंगपाल दीक्षित, अमित सिंह, सौम्या, शोभा सिंह सहित बड़ी संख्या में काव्यप्रेमी नागरिक उपस्थित रहे।


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