अम्बिकापुर। महान् स्वतंत्रता-सेनानियों सरदार भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु के बलिदान-दिवस पर तुलसी साहित्य समिति द्वारा केशरवानी भवन में शायर-ए-शहर यादव विकास की अध्यक्षता में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान विश्व कविता और जलदिवस पर भी सार्थक चर्चा की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ व्याख्याता सच्चिदानंद पांडेय, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता व पीजी कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ब्रह्माशंकर सिंह और उपभोक्ता अधिकार संगठन के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रभूषण मिश्र ‘मृगांक’ थे। संचालन संस्था की उपाध्यक्ष आशा पांडेय ने किया।
मां सरस्वती की पारंपरिक पूजा पश्चात् कार्यक्रम का विधिवत् शुभारंभ हुआ। तुलसीकृत रामचरितमानस व कविवर एसपी जायसवाल द्वारा सृजित सरगुजिहा रामायण का पाठ भी किया गया। गीतकवि कृष्णकांत पाठक ने सुमधुर सरस्वती-वंदना की प्रस्तुति दी। प्रतिष्ठित विद्वान ब्रह्माशंकर सिंह ने कहा कि विश्व कविता दिवस हर साल 21 मार्च को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य कवियों और उनकी सृजनशीलता को सम्मानित करना है। काव्य की उत्पत्ति पीड़ा से होती है। हमारे आदिकवि महर्षि वाल्मीकि हैं, जिन्होंने संस्कृत में ‘रामायण’ की रचना की। महाकवि प्रसाद ने सात सर्गों में ‘कामायनी’ महाकाव्य का प्रणयन किया। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘साकेत’ महाकाव्य लिखा। कवि सुमित्रानंदन पंत की तुलना अंग्रेज़ी के कवि वर्ड्सवर्थ से की जाती है। कविता दिवस पर हमें कवियों और उनकी कृतियों का सम्मान करना चाहिए। सच्चिदानंद पांडेय ने विश्व जलदिवस पर जल के संरक्षण पर विशेष ज़ोर देते हुए बताया कि विश्व में 99 प्रतिशत जल झीलों, नदियों, समुद्रों आदि प्राकृतिक जल स्रोतों में समाहित है। मात्र एक प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। हम प्रायः जल का संचय न कर उसे व्यर्थ ही बर्बाद करते रहते हैं, जबकि जल की हरेक बूंद अत्यंत कीमती है। हमें पानी बचाने का संकल्प लेना होगा। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर का कहना था कि ग्राम पंचायतों, नगर पालिकाओं और नगर निगमों के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं को नदियों और नालों में बह रहे पानी के शोधन का प्रयास करना चाहिए तभी जल संरक्षण का सपना साकार हो सकेगा और भावी पीढ़ी की रक्षा हम भलीभांति कर पाएंगे। पं. चंद्रभूषण मिश्र ने महान् क्रांतिकारियों सरदार भगत सिंह, सुखदेव और शिवराम राजगुरु के 23 मार्च 1931 को अंग्रेज़ों द्वारा लाहौर जेल में दी गई फांसी को याद करते हुए कहा कि उनकी अमर शहादत से देशवासियों के हृदय में आज़ादी के लिए मर मिटने का जज़्बा पैदा हुआ जिसने स्वतंत्रतारूपी सूर्य को उगाने का ऐतिहासिक कार्य किया। देश इन रणबांकुरों के बलिदान को सदैव याद रखेगा।
काव्यगोष्ठी में कवि संतोष सरल ने अपनी कविता में स्पेशक्वीन सुनीता विलियम्स की अंतरिक्ष से धरती पर सफल वापसी को मानवीय विजय का ऐतिहासिक व यादगार पल बताया- आज प्रकृति को दे चुनौती मानव-विज्ञान फिर जीता। एक-एक पल वापसी का न पूछो कैसे चिंता में बीता। प्रसन्न है पूरा विश्व कि 286 दिनों की कठिन यात्रा कर अंतरिक्ष से धरती पे लौटी है देश की बिटिया सुनीता! आशुकवि विनोद हर्ष ने जनमानस की मलिन मानसिकता का परिचय यूं कराया- जाने क्या चल रहा है लोगों के दिमाग़ में। बचाकर होलिका फूंक रहे हैं प्रहलाद को आग में! कवयित्री माधुरी जायसवाल ने अपने जीवन की विवशता को शब्दों में पिरोते हुए कहा- जो अपना ना बने मन से उसे कहना पड़ता है। ज़िंदगी को चलाने को साथ में रहना पड़ता है। चोट तो लगती है, दर्द तो लाज़मी होगा। दवा-दारू खूब कर लो उसे तो सहना पड़ता है! कुछ ऐसी ही पीड़ा वरिष्ठ कवयित्री मंशा शुक्ला के काव्य में भी मुखरित हुई- सहकर दंश अपनों का जीना है बड़ा मुश्किल। पीकर दर्द जीवन में जीना है बड़ा मुश्किल। जिसे चाहा, जिसे पूजा, बसाया है जिसे मन में, दुखाना उसके ही दिल को होता है बड़ा मुश्किल। कवयित्री आशा पांडेय ने जब गीतों की झनकार में शामिल होने की बात कही तो सभी ने ताली बजाकर उनका अभिनंदन किया- गीतों की झनकार में शामिल हो जाएं, सारेगामा के संसार में शामिल हो जाएं। मन की बातें कहते छंदों-ग़ज़लों में। भावों के अशरार में शामिल हो जाएं!
काव्यगोष्ठी में वरिष्ठ गीतकार रंजीत सारथी ने जब अत्यंत मधुर स्वर में सरगुजिहा गीत सुनाया तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे। जीवन की नश्वरता का सहज बोध हो आया। पंक्तियां देखिए- ऐ पिंजरा कर मैना रे, ऐ पिंजरा छूट जाही भइया, ऐ काया छूट जाही रे! इसी तारतम्य में वरिष्ठ गीतकार पूनम दुबे ‘वीणा’ ने भी दुनिया को रंगमंच बताकर कर्मपथ पर चलने का आह्वान अपने गीत द्वारा किया- रंगमंच है ये दुनिया, नित्य आंखों में पलते सपने। जीवन है संघर्ष बड़ा, आशाओं के क्या कहने! कर्मपथ पे सदा चलना, कल की बस उम्मीद लिए। दर्द किसी से मत कहना! प्रेम और श्रृंगार के जाने-माने कवि कृष्णकांत पाठक पुरानी यादों में खोए-से जान पड़े। उन्होंने फरमाया- बहुत याद आता है गुज़रा ज़माना, वो मेरी दीवानी, मैं उसका दीवाना! वरिष्ठ कवि चंद्रभूषण ने अपनी रचना में माशूका की तारीफों के पुल बांध दिए - तेरी मधुर चमन-सी बातों में गंगा का उद्गम देखा था, सागर-सी सिक्त आंखों में जादू-सा अपनापन देखा था। प्रस्फुटित कम्पित कमल की तरह खिलना तुम्हारा। बातों का मृदु मधुमास लिए मुस्कुराना तुम्हारा। वरिष्ठ कवयित्री गीता दुबे ने जीने की सच्ची कला बताई- ज़िंदगी जो मिली है तो जी लो। सबसे हंसके मिलो, मुस्कुरा लो। महलों के सपने न पालो, प्यार से जो मिले, संभालो!
कविता से ज़िदगी और हालात के बदलने की बात संस्था के अध्यक्ष दोहाकार व शायर मुकुंदलाल साहू ने अपने दोहे में कही- कविता बदले हृदय को, बदले ये हालात। बदलेगी यह ज़िंदगी, मानो मेरी बात। उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे महान् स्वतंत्रता सेनानियों को यादकर यह दोहा भी प्रस्तुत किया- प्राणों को जिनने दिया, आज़ादी के नाम। अमर ज्योति हैं आज वे, उनको करें प्रणाम। गोष्ठी में कवि डॉ. उमेश पांडेय की कविता- मैं रास्ते का वह पत्थर सबको राह दिखाता चलूं, कविवर रामलाल विश्वकर्मा की- पावस में जब पड़ती फुहार, हर बूंद करे इनको दुलार- को श्रोताओं का भरपूर प्यार और आशीर्वाद मिला। शायर-ए-शहर यादव विकास ने भी एक उम्दा ग़ज़ल सुनकार महफिल लूट ली- क्या-क्या न गुल खिलेंगे गुले-लालाज़ार में। पत्थर भी ज़बा खोलेंगे अबके बहार में। मौसम ने जब बहार का घूंघट उलट दिया, फिर उसके बाद दिल न रहा अख्तियार में। खुशबू तुम्हारी आकर चौंका दिया मुझे, वरना खड़ा ही रहता तेरे इंतज़ार में। मुझमें और तुझमें यही फ़र्क है विकास, मैं दिलपसंद दिल में रहा, तुम इश्तहार में! अंत में वरिष्ठ कवि डॉ. सुधीर पाठक की धर्मपत्नी श्रीमती मंजू पाठक को दो मिनट का मौन रखकर भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। धन्यवाद-ज्ञापन कवयित्री माधुरी जायसवाल ने किया। इस अवसर पर लीला यादव, केके त्रिपाठी, दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव, प्रमेद और केशरवानी वैश्यसभा के उपाध्यक्ष मनीलाल गुप्ता उपस्थित रहे।




