अंबिकापुर। खबरी गुल्लक ।
श्राद्ध पक्ष पर तुलसी साहित्य समिति की ओर से केसरवानी भवन में पूर्व व्याख्याता सच्चिदानंद पांडेय के मुख्य आतिथ्य और आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर की अध्यक्षता में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ कवि देवेंद्रनाथ दुबे, प्रताप पांडेय, चंद्रभूषण मिश्रा, शशिकुमार साहू और डॉ. विजयप्रसाद शुक्ला उपस्थित रहे। संचालन कवयित्री आशा मिश्रा ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां वाग्देवी की पारंपरिक पूजा से हुआ। महाकवि तुलसीदास, बीडी लाल और एसपी जायसवाल द्वारा रचित रामायणों का भी संक्षिप्त पाठ किया गया। तदनंतर पं.सच्चिदानंद पांडेय ने श्राद्ध पक्ष की महिमा बताते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने पितरों का श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध में माता-पिता की तीन पीढ़ियां शामिल होती हैं, जिन्हें जल और भोज्य पदार्थ देकर संतुष्ट करना होता है। जल में काले तिल मिलाकर देने से पितरों को ऊर्जा मिलती है। पुत्र के अलावा पौत्र, भतीजा, भांजा भी पानी दे सकता है। घर में पुरुष सदस्य ना होने पर दामाद भी श्राद्ध कर सकते हैं। श्राद्ध और तर्पण से पूर्वजों व पितरों का आशीर्वाद एवं कृपा मिलती है, जिससे वंशजों के कष्टों की निवृत्ति होती है, रोग, शोक, दुःख, दीनता का भी शमन होता है और उन्हें सुख, सौभाग्य, शांति और सफलता की संप्राप्ति होती है।
काव्य गोष्ठी में संस्था के अध्यक्ष, दोहाकार व शायर मुकुंद लाल साहू ने पितरों की सेवा से कामनापूर्ति की बात अपने दोहे में कही- श्राद्ध पक्ष में आ गए, पितर हमारे पास। हम उनकी सेवा करें, पूरी होगी आस।कवि प्रकाश कश्यप ने अपने दोहे में पितरों की कृपा से सब काज बनने का जिक्र किया- श्रद्धा से सुमिरन करें, पितृ जनों को आज। जिनकी महिमा से बनें, जग के सारे काज। कवयित्री मंशा शुक्ला ने संतानों से जीवन में उजाला लाने का आग्रह किया- जीते जी इतना कर देना, मत करना तर्पण मर जाने पर। अंजलिभर धूप ले खुशियों की, जीवन उजास से भर देना। आशा मिश्रा ने पूर्वजों के प्रति अपना अगाध प्रेम यूं प्रदर्शित किया- तुम्हारे लिए ही जीती हूं और तुम्हारे लिए ही मरती हूं, तुमसे अभी भी प्रेम है। सीमा तिवारी ने घर के अहम सदस्य के देहांत होने पर खेद जताया- आज घर का वह सितारा दूर हमसे हो गया, रुक गई यही कहानी, मौन यह जग हो गया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि डॉ. विजयप्रसाद शुक्ला की कविता- सितारों से पूछो बसेरा कहां है, करे लोक रोशन सवेरा कहां है, देववंश दुबे की गजल- रंग कुछ जिंदगी में भरने दो, मैं हूं खुशबू मुझे बिखरने दो, पं. चंद्रभूषण मिश्रा की- ढूंढता ही रहा चले जाने के बाद, टूटता ही रहा ठोकर खाने के बाद, आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर की रचना- तोड़ो ना पुष्प पौधों से, एक पौधा लगाओ, वह भी खिल उठेगा और हम भी खिल उठेंगे, प्रदीप सोनी की पर्यावरणीय समस्याओं पर केंद्रित व्यंग्य कविता- सड़क गायब, तालाब गायब, बांध गायब और क्या करें गायब, चलो गायब-गायब खेलें, अमित प्रेम की- हो नया या पुराना यहां पर, कभी प्रेम बंधन नहीं तोड़ना चाहिए, अजय सागर की कविता- जिंदगी में सुख है, दुख है, फूल और कांटे सनम, राजेश पांडेय 'अब्र' की गजल- उपवन में भी काशीवासी होते हैं, फूलों में भी संन्यासी होते हैं, रामलाल विश्वकर्मा की- देख तसल्ली जिंदगी को, गीत वह मिलता नहीं है, उनके हाथों का लिखा अब खत कोई मिलता नहीं है, श्यामबिहारी पांडेय की गजल- तेरा चेहरा मेरी जां खिला है, इस जमाने को इसका गिला है, कृष्णकांत पाठक का गीत- चूमकर हमने जब से उठा ली कलम, झूमकर नाच उठे चांद-तारे-गगन, प्रताप पांडेय की कविता- उलझनों और कशमकश में उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूं, जिंदगी तेरी हर चाल पर दोचाल लिए बैठा हूं और वरिष्ठ गीतकार देवेंद्रनाथ दुबे का प्रेरक गीत- मन की मलिनता को मिटाते चलिए, नेकी की बस्ती बसाते चलिए, अंधेरों का साम्राज्य हो दिखता जिधर, उस दिशा में ही दिया जलाते चलिए- ने सबको भावविभोर कर दिया। कवि अजय सागर ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान केके त्रिपाठी, दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव, प्रियंका तिवारी और अनिल त्रिपाठी सहित अन्य काव्यप्रेमी उपस्थित रहे।




