माटी के भाखा मा हृदय के स्पंदन बसे रहिथे... बजाभाषाई समृद्धि का डंका, बेमेतरा में सरगुजा के साहित्यकारों ने छोड़ी छाप

माटी के भाखा मा हृदय के स्पंदन बसे रहिथे... बजाभाषाई समृद्धि का डंका, बेमेतरा में सरगुजा के साहित्यकारों ने छोड़ी छाप

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अंबिकापुर। बेमेतरा। खबरी गुल्लक 

माटी के भाखा मा हृदय के स्पंदन बसे रहिथे... इसी चेतना के साथ बेमेतरा में संपन्न हुए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के 10वें प्रांतीय सम्मेलन में सरगुजा अंचल की साहित्यिक और भाषाई समृद्धि का डंका बजा। 26-27 सितंबर 2026 को आयोजित इस दो दिवसीय वृहद आयोजन में जहाँ पूरे प्रदेश से 500 से अधिक भाषाविद् और साहित्यकार जुटे, वहीं सरगुजा के साहित्यकारों को मिले सम्मान और अंचल की बोलियों पर हुए विमर्श ने प्रांतीय पटल पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

सम्मेलन का उद्घाटन सत्र सरगुजा अंचल के लिए विशेष गौरव का क्षण लेकर आया। मंच पर वरिष्ठ साहित्यकार श्याम कश्यप ‘बेचैन’ और भोला प्रसाद मिश्र अनाम को मुख्य अतिथि दुर्ग सांसद विजय बघेल द्वारा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष राज्य मंत्री दर्जा प्रभात मिश्र की उपस्थिति में राज्य स्तरीय साहित्यिक सम्मान से अलंकृत किया गया।

आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्र के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शी विजन का ही परिणाम है कि आज सरगुजिहा, कुड़ुख और हल्बी जैसी आंचलिक बोलियों को प्रांतीय स्तर पर इतना मजबूत मंच मिल रहा है। छत्तीसगढ़ी साहित्य और संस्कृति को सहेजने के साथ-साथ अंचल की सभी क्षेत्रीय बोलियों को एक सूत्र में पिरोने और उन्हें उचित सम्मान दिलाने का प्रभात मिश्र का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय रहा।

विशेष रूप से श्याम कश्यप 'बेचैन' का यह सम्मान सरगुजा के साहित्यिक अवदानों की एक बड़ी स्वीकृति है। श्याम कश्यप इससे पूर्व भी राष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित होते रहे हैं। उन्होंने देश भर के प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी मर्मस्पर्शी ग़ज़लों और गीतों के शानदार काव्य-पाठ से सरगुजा का नाम रोशन किया है। विभिन्न टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले प्रसिद्ध कवि सम्मेलनों में भी उनकी निरंतर और उपस्थिति रही है, जहाँ उन्होंने अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से सरगुजा की सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय पटल पर और ऊँचा उठाने का गौरवमयी कार्य किया है। सरगुजा में रचित उनकी तथा भोला प्रसाद मिश्र 'अनाम' की उत्कृष्ट कृतियों को मिला यह सम्मान साबित करता है कि सरगुजा की माटी के साहित्य की गूंज अब पूरे प्रदेश में पूरे आदर के साथ सुनी जा रही है।

प्रादेशिक बोलियों और आंचलिक अभिव्यक्तियों पर केंद्रित छठवें सत्र में सरगुजा से पधारे साहित्यकार श्रीश मिश्र का व्याख्यान आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा। अपने सारगर्भित और तथ्यपरक वक्तव्य में उन्होंने सरगुजिहा और छत्तीसगढ़ी भाषा के बीच परस्पर साम्य और गहरे भाषाई जुड़ाव को मंच पर रखा। उनके व्याख्यान ने स्पष्ट किया कि उत्तर छत्तीसगढ़ की सरगुजिहा बोली किस प्रकार प्रांतीय भाषाई ताने-बाने को अपनी मिठास से पूर्ण करती है।

सम्मेलन में भाषाई विविधता केवल सरगुजिहा तक सीमित नहीं रही। इसी सत्र में डॉ. ईशा बेला लकड़ा ने सरगुजा संभाग की प्रमुख जनजातीय भाषा 'कुड़ुख' पर अपना विशेष वक्तव्य प्रस्तुत किया। इस दौरान सरगुजा अंचल की अन्य समृद्ध जनजातीय एवं लोक बोलियों जैसे कोरवा, पंडो, नगेसिया और सादरी के संरक्षण और संवर्धन का संदेश भी गूंजा। इसके साथ ही बस्तर अंचल की प्रमुख जनजातीय भाषाओं जैसे हल्बी, गोंडी और भतरी की भी गूंज मंच पर सुनाई दी, जहाँ शकुंतला तरार ने हल्बी भाषा में अपना वक्तव्य देकर बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा को मंच पर अभिव्यक्ति दी।

इसी महत्वपूर्ण विमर्श के बीच प्रदेश की विलुप्त होती कमार जनजाति की भाषा के उत्थान और संरक्षण हेतु किए जा रहे विशेष प्रयासों पर भी गंभीरता से चर्चा की गई। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्र ने विलुप्त हो रही जनजातीय सभ्यता, संस्कृति और उनकी भाषाओं के संरक्षण व उन्नयन के प्रति मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता की सराहना करते हुए शासन का विशेष आभार ज्ञापित किया। उत्तर, दक्षिण और मध्य छत्तीसगढ़ की इन प्रस्तुतियों ने समूचे प्रदेश की जनजातीय विरासत को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया।

सम्मेलन में अंचल की लोक-कथाओं और ठेठ शब्दावली को  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल माध्यमों से सहेजने पर भी विशेष जोर दिया गया। डॉ. अंकुर शुक्ला (अंकुर विनोद ‘खावर’) द्वारा प्रस्तुत AI आधारित ‘छत्तीसगढ़ राजभाषा गीत एवं गान’ के प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया कि नई तकनीक के उपयोग से सरगुजिहा, कुड़ुख, कमार और कोरवा जैसी भाषाओं का भी व्यापक डिजिटल दस्तावेजीकरण किया जा सकता है।

मुख्य अतिथि दुर्ग सांसद विजय बघेल ने छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने का संकल्प दोहराया। वहीं ‘पुरखा के सुरता’ सत्र में डॉ. चितरंजन कर की अध्यक्षता में अंचल के पुरोधा साहित्यकारों को याद किया गया। कार्यक्रम में बेमेतरा विधायक दीपेश साहू और पूर्व विधायक अवधेश सिंह चंदेल ने भाषाई विकास के लिए शासन-प्रशासन की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

सरगुजावासियों के लिए यह 10वाँ प्रांतीय सम्मेलन एक ऐतिहासिक पल बन गया है, जहाँ न केवल अंचल के साहित्यकारों की लेखनी को राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया, बल्कि सरगुजिहा, कुड़ुख, सादरी और कमार जैसी भाषाओं ने प्रांतीय विमर्श में अपनी एक मजबूत और अधिकारपूर्ण जगह बनाई है।

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