क्या आपने कभी धरती पर बादलों का समुद्र देखा है, यदि नहीं..तो आप छत्तीसगढ़ के शिमला और मिनी तिब्बत के नाम से मशहूर सरगुजा के इस इलाके में जरूर आइए... पहाड़ के ऊपर बसे यहां की खूबसूरत वादियों में मानसून के दस्तक देते ही बादलों ने कैसे जमीन पर डेरा डाला है....पढ़ें पूरी खबर..देखें फोटो और वीडियो .

क्या आपने कभी धरती पर बादलों का समुद्र देखा है, यदि नहीं..तो आप छत्तीसगढ़ के शिमला और मिनी तिब्बत के नाम से मशहूर सरगुजा के इस इलाके में जरूर आइए... पहाड़ के ऊपर बसे यहां की खूबसूरत वादियों में मानसून के दस्तक देते ही बादलों ने कैसे जमीन पर डेरा डाला है....पढ़ें पूरी खबर..देखें फोटो और वीडियो .

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अंबिकापुर (विकास बारी।) क्या आपने कभी बादलों का समुद्र देखा है, यदि नहीं..तो आप छत्तीसगढ़ के शिमला के नाम से मशहूर सरगुजा जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल मैनपाट जरूर आइए।  मानसून के दस्तक देने के साथ ही  मानो यहां की खूबसूरत वादियों में  सफेद बादल धरती पर उतर आई हो... विस्मित कर देने वाला यह नजारा प्रकृति के किसी तिलस्म से कम नहीं है। वीडियो में नजर आ रहा है कि आसमान से  बादलों का सैलाब कैसे धरती पर उतर रहा है... और सहसा ही बादलों का यह समूह  महासमुद्र का आभास करा रहा है। विदित हो कि मैनपाट को मिनी तिब्बत भी कहा जाता है, यहां टाइगर प्वाइंट, मछली प्वाइंट, दलदली, उल्टापानी सहित अन्य घूमने लायक, पिकनिक स्पॉट हैं। यहां वर्ष भर देश के विभिन्न क्षेत्रों से सैलानी पहुंचते हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां सर्दी के मौसम में धुंध का भी मनमोहक नजारा होता है। आम तौर पर अन्य मौसम में भी यहां कोहरे की स्तिथि बनती है। इधर 24 जून को मानसून ने सरगुजा में दस्तक दे दी है। मैनपाट में इस मौसम में बादल के धरती पर उतरने के दृश्य को सैलानी कैमरे में भी कैद कर रहे हैं। वीडियो में नजर आ रहा है कि कैसे बादल पहाड़ और धरती पर उतर रहे हैं..!

अभी बादलों की ऊंचाई है महज 10 से 11किमी ...इन सब मौसमी घटनाओं को लेकर मौसम वैज्ञानिक अक्षय मोहन भट्ट ने बताया कि  मैनपाट की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 1085 मीटर की है। बारिश के मौसम में अभी बादलों की धरती से ऊंचाई मात्र 10 से 11किमी है, कहीं - कहीं इससे भी नीचे बादल बनते हैं। उन्होंने ने बताया कि पठारी, पहाड़ी इलाकों में ऐसे मौसम में अक्सर बादल पहाड़ों, जमीन तक पहुंच जाते हैं, उन्होंने बताया कि पठारी इलाके पहले से ही ऊंचे स्थान पर होते हैं इसलिए ऐसे दृश्य बारिश के मौसम में अक्सर बनते हैं। इस समय मेघालय सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में भी ऐसे दृश्य बन रहे हैं।




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