शेर की दहाड़ और हाथियों की चिंघाड़ के हटते ही भारतीय सर्कस से गायब हुई रौनक... 80 फीसदी खाली सीटों के बीच दिल में दर्द लिए प्रदर्शन कर रहे कलाकार... शो खत्म होने के बाद खुशियों के बजाय मिलती है मायूसी ... हताशा और अकेलापन..... कलाकारों ने कहा क्या हमारी जिंदगी में कभी जानवरों के साथ खुशियां लौटेगी......

शेर की दहाड़ और हाथियों की चिंघाड़ के हटते ही भारतीय सर्कस से गायब हुई रौनक... 80 फीसदी खाली सीटों के बीच दिल में दर्द लिए प्रदर्शन कर रहे कलाकार... शो खत्म होने के बाद खुशियों के बजाय मिलती है मायूसी ... हताशा और अकेलापन..... कलाकारों ने कहा क्या हमारी जिंदगी में कभी जानवरों के साथ खुशियां लौटेगी......

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अंबिकापुर ( विकास बारी)।
आज के आधुनिक दौर में सर्कस की दुनिया अपने प्रौढ़ काल में गुजर रही है... तमाम प्रचार, और मशक्कत के बाद भी हर शो में कुर्सियां.. 75 से 80 फीसदी खाली रह जाती हैं, शो छूटने के बाद कलाकारों में न उत्साह होता और न ही और बेहतर करने की हसरत... जान हथेली पर रख लोगों का मनोरंजन करने के बाद भी अंत में बेबसी और.... अकेलापन ही मिल रहा है...!
आज के समय में राज कपूर के मेरा नाम जोकर फिल्म की एक गीत के पहले की यह बोल .... हां बाबू ऐ सर्कस है, और ऐ सर्कस है तीन घंटे का.... पहला घंटा बचपन है..,  दूसरा दूसरा जवानी... और तीसरा ...बुढ़ापा है..! सही साबित हो रही है। मौजूदा समय में नागरिकों की अरुचि और शासन - प्रशासन की अनदेखी से सर्कस की दुनिया अपने अस्तित्व को बचाने संघर्ष कर रही है। यदि इस नायाब स्वस्थ  मनोरंजन के प्रति शासन स्तर कोई ध्यान नहीं दिया गया तो वह समय दूर नहीं है जब सर्कस केवल किताबों, इतिहास का हिस्सा बन कर रह जाएंगी।  सोसल मीडिया में भी लोगो को सिर्फ पुरानी वीडियो ही देखने को मिलेंगी....! 
विरासत में मिली यह धरोहर
ग्रेट जेमिनी सर्कस के संचालक बदायूं उत्तर प्रदेश निवासी आजम  सिद्धिकी ने बताया कि उनके पिता स्व. असलम सिद्धिकी विश्व विख्यात एशियार्ड सर्कस में प्रबंधक के रूप में काम करते थे, यहीं से पिताजी ने सर्कस के प्रबंधन के सारे गुर सीखे और नए कलाकारों की अच्छी टीम खड़ी कर खुद का ग्रेट जेमिनी सर्कस बना लिया। यह सर्कस पिछले 30 से 40 वर्षो तक लोगों के दिल और दिमाग में राज करती रही। कोविड से पिता की एक वर्ष पूर्व मृत्यु होने के बाद उन्होंने सर्कस का बागडोर संभाला।
पहले जानवरों की आवाज से ही फूल हो जाती थी सीटें
 ग्रेट जेमिनी सर्कस के संचालक आजम सिद्धिकी ने बताया कि पहले सर्कस में जानवरों को रखने की अनुमति थी, उस दौरान जानवरों की आवाज, शेर की दहाड़, हाथियों की चिंघाड़ से सारी सींटे फूल हो जाती थी, वह समय सर्कस का स्वर्ण काल था। चार - पांच दिन एडवांस में ही सीटें भर जाती थी, लोगों को शो के टिकिट के लिए घंटो लाइन में लगना पड़ता था। पहले 400 से अधिक कलाकार , कर्मचारी रहते थे, मगर अब मात्र 100 से 150 कर्मचारी की शेष बचे हैं।  
इस वजह से टूट रही यह कला

जेमिनी सर्कस के संचालक ने बताया कि वर्ष दो 2000 के पूर्व तक सर्कस में शेर, हाथी, घोड़ा, भालू , बंदर, ऊंट जैसे जानवर मुख्य पार्ट होते थे। इन जानवरों की देखभाल के लिए उनके पास रिंग मास्टर, महावत के साथ कर्मचारियों का पूरा फौज रहता था। मगर बाद में जानवरों को रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके लिए नए कानून बन गए। फिर क्या था सर्कस के जानवरों को सरकार ने अधिग्रहित कर लिया , अब यह जानवर कहां और किस हाल में हैं कोई नहीं जानता। जानवरों के न रहने से सभी सर्कस आधी टूट गई, जो किसी प्रकार चल रही थी वह कोरोना महामारी में खत्म हो गई।

दीवानों की फौज ने शो को रखा है जिंदा, अब नए कलाकार नही
जेमिनी सर्कस के संचालक ने बताया कि सर्कस के कलाकारों की इस पेशे के प्रति दीवानगी ने इसे इस कठिन दौर में भी जिंदा रखे हुए है। चिंता इस बात की है कि इस क्षेत्र में अब भविष्य नही दिखने के कारण नई युवा पीढ़ी का रुझान नही है। यह बताते हुए जेमिनी सर्कस के संचालक आजम सिद्धिकी का गला रूंधिया गया। उन्होंने कहा कि प्रौढ़ काल से गुजर रही सर्कस अब न जाने कब दम तोड़ देगी...!
हमें चाहिए बस इतनी सी मदद
जेमिनी सर्कस के संचालक ने कहा कि सर्कस के शो के लिए स्थानीय प्रशासन से हमें मैदान की  जरूरत पड़ती है, यदि मैदान हमें सस्ते दर पर अधिक समय के लिए मिल जाए तो कुछ हद तक हमारी भी रोजी रोटी चल सकेगी।  कोरोना काल में तीन लगभग तीन साल सर्कस बंद रही, जिससे कलाकारों के समक्ष जीविकोपार्जन चुनौती बनी रही। सरकार ने भी हमारी ओर ध्यान नहीं दिया, जिससे कई सर्कस इस संक्रमण काल में ही खत्म हो गई।   उन्होंने कहा कि सरकार को हमारी भी सुध लेनी चाहिए। यदि कुछ जानवरों को रखने की अनुमति मिल जाए तो संभवतः प्रौढ़ अवस्था में फिर से जान आने के साथ सर्कस के शो में ताकत लौट सकती है।

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