अंबिकापुर। क्या आपने कभी साप्ताहिक बाजारों में ईट या पत्थर पर बैठ कभी बाल या दाढ़ी बनवाई है, यदि हां तो यह तस्वीर आपके पुराने यादों को ताजा करने के लिए काफी है...! एक समय था जब पिता या दादा की उंगली पकड़ बाजार जाते थे और उनकी डपट के साथ ईंट पर बैठ बाल बनवाते थे। मगर यह कोई बीते दौर की बांते नही है बल्कि आज भी साप्ताहिक बाजारों में ऐसी तस्वीर मिल जाती है। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि यह हमारा पुश्तैनी कारोबार है..! बाजार में उस्तरा, कैंची लेकर बैठे लोगों का कहना है कि रोजी रोटी के लिए किसी एक स्थान पर गुमटी, अथवा दुकान बनाने की हमने योजना ही नहीं बनाई, पुरखे झोले में समान रख सुबह निकल जाते थे, और शाम को राशन का प्रबंध कर वापस लौट जाते थे, जहां भी भीड़ होती है उनका कारोबार चल जाता है। इसी पुश्तैनी काम के बूते न सिर्फ परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं बल्कि बच्चों को शिक्षा भी दे रहें हैं। संभाग मुख्यालय अंबिकापुर के सप्ताहित कम्पनी बाजार में हर रविवार को इसी तस्वीर देखने को मिलती है। आज भी लोग ईट पर बैठ बाल दाढ़ी बनवाते देखे जाते हैं। आज के दिखावटी और बनावटी दुनिया में भी कुछ लोग ऐसे जो अपने पुश्तैनी कारोबार को उसी स्वरूप में जिंदा रखे हुए हैं, जिस स्वरूप में पुरुखों ने उन्हें सौंपा था....!
क्या आप भी कभी पिता या दादा के साथ साप्ताहिक बाजार में ईट पर बैठ बाल या दाढ़ी बनवाए हैं... यदि हां तो यह तस्वीर आपकी पुरानी यादों को ताजा कर देगी... कुछ लोग अभी भी अपनी पुश्तैनी कारोबार को पुराने स्वरूप में जिंदा रखे हुए हैं..
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जुलाई 11, 2023
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अंबिकापुर। क्या आपने कभी साप्ताहिक बाजारों में ईट या पत्थर पर बैठ कभी बाल या दाढ़ी बनवाई है, यदि हां तो यह तस्वीर आपके पुराने यादों को ताजा करने के लिए काफी है...! एक समय था जब पिता या दादा की उंगली पकड़ बाजार जाते थे और उनकी डपट के साथ ईंट पर बैठ बाल बनवाते थे। मगर यह कोई बीते दौर की बांते नही है बल्कि आज भी साप्ताहिक बाजारों में ऐसी तस्वीर मिल जाती है। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि यह हमारा पुश्तैनी कारोबार है..! बाजार में उस्तरा, कैंची लेकर बैठे लोगों का कहना है कि रोजी रोटी के लिए किसी एक स्थान पर गुमटी, अथवा दुकान बनाने की हमने योजना ही नहीं बनाई, पुरखे झोले में समान रख सुबह निकल जाते थे, और शाम को राशन का प्रबंध कर वापस लौट जाते थे, जहां भी भीड़ होती है उनका कारोबार चल जाता है। इसी पुश्तैनी काम के बूते न सिर्फ परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं बल्कि बच्चों को शिक्षा भी दे रहें हैं। संभाग मुख्यालय अंबिकापुर के सप्ताहित कम्पनी बाजार में हर रविवार को इसी तस्वीर देखने को मिलती है। आज भी लोग ईट पर बैठ बाल दाढ़ी बनवाते देखे जाते हैं। आज के दिखावटी और बनावटी दुनिया में भी कुछ लोग ऐसे जो अपने पुश्तैनी कारोबार को उसी स्वरूप में जिंदा रखे हुए हैं, जिस स्वरूप में पुरुखों ने उन्हें सौंपा था....!
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