नशबंदी फेल होने पर फिर मां बनी महिला .....न्यायालय ने खंड चिकित्सा अधिकारी और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी पर ठोका 23 लाख की क्षतिपूर्ति राशि ... नंबर 2021 से अदायगी दिनांक तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देना होगा ....

नशबंदी फेल होने पर फिर मां बनी महिला .....न्यायालय ने खंड चिकित्सा अधिकारी और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी पर ठोका 23 लाख की क्षतिपूर्ति राशि ... नंबर 2021 से अदायगी दिनांक तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देना होगा ....

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अंबिकापुर। नशबंदी फेल होने के एक मामले में स्थाई लोक अदालत के द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र वार्डफनगर के तत्कालीन खंड चिकित्सा अधिकारी और तत्कालीन मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी पर 23 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति देने आदेश जारी किया गया है। नशबंदी फेल होने पर सजा का संभवतः संभाग का यह पहला मामला है। न्यायालयीन सूत्रों के मुताबिक शारदापुर हरिजनपारा निवासी शांति रवि पति बुधन कुमार लहरे के द्वारा एक पुत्र व दो पुत्री कुल तीन संतान होने पर महिला नशबंदी परामर्शदाता अमल किशोर पटवा की सलाह पर नशबंदी के लिए खंड चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में पंजीयन कराया गया था, इसके बाद 24 दिसंबर 2019 को जिला अस्पताल अंबिकापुर में नशबंदी कर प्रमाण पत्र दिया गया था। इसके कुछ माह बाद महिला गर्भवती हो गई, जांच कराने पर चिकित्सकों ने बताया कि गर्भ से शिशु को निकलने पर मां की जान को खतरा है। इसके बाद महिला का 12 दिसंबर 2020 को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मूरकौल वार्डफनगर में प्रसव हुआ जिसमें उन्होंने पुत्री रत्न को जन्म दी। जिसका नाम सृष्टि रखा गया। इसके बाद विशेषज्ञ डॉ ने बताया कि उसे प्रत्येक तीन माह में गर्भ निरोधक टीका लगवाना पड़ेगा। क्योंकि नशबंदी फेल हो गया है। इस प्रकार पीड़िता को प्रत्येक तीन माह में गर्भ निरोधक टीका लगवाने एमपीए कार्ड जारी कर लगवाया जा रहा है। नशबंदी फेल होने पर एक बेटा, तीन बेटी के साथ पीड़िता के बच्चों की संख्या चार हो गई। पीड़िता शांति रवि के द्वारा शारीरिक, मानसिक,आर्थिक परेशानी को देखते हुए 50 लाख क्षतिपूर्ति दिए जाने न्यायालय में 50 लाख का वाद पेश किया गया था। इस दावा पर द्वितीय पक्ष स्वास्थ्य विभाग के द्वारा नशबंदी के दौरान भरे पीड़िता द्वारा भरे गए सहमति पत्र में उल्लेखित शर्तों का हवाला देते हुए कहा गया था कि कभी कभार नशबंदी फेल हो सकता है, इससे शासकीय अस्पताल अथवा आपरेशन करने वाले को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, स्वास्थ्य विभाग के जबाब में यह भी कहा गया कि आवेदिका ने सहमति पत्र में उल्लेखित शर्तों का पालन नहीं किया जिससे वह क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार नहीं रखती है दोनो पक्ष का दलील सुनने के बाद स्थाई लोक अदालत की अध्यक्ष उर्मिला गुप्ता और सदस्य संतोष कुमार शर्मा ने कहा कि अनावेदक सिर्फ निर्देश लिख देने से अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता। विधि विरुद्ध निर्देश है कि यदि नशबंदी फेल होता है तो आवेदिका न्यायालय से क्षतिपूर्ति नही ले सकती है, आवेदिका पर बंधनकारी नही है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्तिथि में यह प्रमाणित पाया जाता है कि अनावेदक क्रमांक दो द्वारा की गई नशबंदी संबंधी सेवा में असफल रही है। जिससे पीड़िता भविष्य में भी प्रभावित होगी। फैसले में न्यायालय ने लिखा है कि न्यायालय यह विश्वास करती है कि नशबंदी फेल होने से सृष्टि का जन्म हुआ। जिसके लालन, पालन, शिक्षा, चिकित्सा, विवाह आदि भविष्य की खर्चा के मद में 20 लाख रुपए और शारीरिक मानसिक पीड़ा पर तीन लाख रुपए कुल 23 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति दिए जाने का फैसला दिया। जिसमें 23 नम्बर 2021 से अदायगी दिनांक तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से उक्त राशि देने आदेश जारी किया गया।

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