इंतेजार-ए-नये साल : क्या करूँ..क्या करूँ .. क्या करूँ ...

इंतेजार-ए-नये साल : क्या करूँ..क्या करूँ .. क्या करूँ ...

khabrigullak.com
By -
0


 कितना बेताब है ये दिल, सपने बेहिसाब हैं

              हर रोज मंहकते दिन हैं, 

हर रोज सुहानी रात है किस सपने को छू लूं?, 

किसको पकडूं ? बात करूँ हर एक की तो, 

                   सभी लाजवाब हैं 

बस यूँ ही चला जा रहा हूँ, 

       अनजाने से प्यार में क्या - क्या ख्वाब संजो रहा हूँ, 

इंतेजार-ए-नये साल में।

       मेरा भी हो एक दिन ऐसा, नये वर्ष का वो नया सबेरा

ले गुलाब की खुशबू को, 

           सारी धरती को मंहकाऊँ ले पलाश की फूलों से, 

गगन सारा भर जाऊँ

         मुरझाये से वन, उपवन को, 

बादल बनकर नहलाऊँ तृप्त करूँ सूखी झीलों को, 

         नदियों के संग बह जाऊँ समा जाऊँ मैं भी इक दिन, 

बासंती बहार में क्या-क्या ख्वाब संजो रहा हूँ,

             इंतेजार-ए-नये साल में।

दुश्मन को याराना बांटू, नफरत को मैं प्यार दूं,

तिल के लड्डू की जैसी, मैं भी पुड़िया दो-चार बांटू।

लहराऊँ खुशियाँ बन कर मैं, 

          हर गरीब के द्वार में क्या-क्या ख्वाब संजों रहा हूँ, 

इंतेजार-ए-नये साल में।

------------

रचयिता - रामजी मण्डावी 

सहायक कुलसचिव 

संत गहिरा गुरू विश्वविद्यालय अंबिका पुर

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)