ब्रेकिंग: मृत मरीज का आयुष्मान योजना से 42 दिनों तक इलाज के मामले में हटाया गया ऑपरेटर.. मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय में दागी कर्मचारियों पर प्रबंधन की मेहरबानी से आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन में नहीं थम रही गड़बड़ी..

ब्रेकिंग: मृत मरीज का आयुष्मान योजना से 42 दिनों तक इलाज के मामले में हटाया गया ऑपरेटर.. मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय में दागी कर्मचारियों पर प्रबंधन की मेहरबानी से आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन में नहीं थम रही गड़बड़ी..

khabrigullak.com
By -
0

अंबिकापुर। खबरी गुल्लक।

मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय अंबिकापुर में मरीज की मृत्यु होने के बाद भी आयुष्मान योजना से 42 दिनों तक इलाज जारी रखे जाने के मामले में अस्पताल प्रबंधन ने डाटा एंट्री ऑपरेटर वीरेंद्र बारी को हटा दिया है। इस मामले को गम्भीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने प्रबंधन को जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। 

यह पहला अवसर नहीं है जब आयुष्मान योजना से जुड़े डाटा एंट्री ऑपरेटर पर कार्रवाई हुई हो। पूर्व में प्रोत्साहन राशि वितरण में कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद डाटा ऑपरेटर राजेंद्र कुमार गुप्ता को संबंधित कार्य से पृथक किया गया था। इसके बाद भी तत्कालीन अस्पताल अधीक्षक डॉ. रमनेश कुमार आर्या द्वारा उन्हें महत्वपूर्ण कार्यालयीन कार्य की जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर सवाल उठे थे।

ऐसे में प्रश्न है कि यदि किसी कर्मचारी को अनियमितता के कारण किसी महत्वपूर्ण कार्य से हटाया गया था, तो उसे दोबारा संवेदनशील अथवा महत्वपूर्ण कार्यालयीन जिम्मेदारी किस आधार पर दी गई? आयुष्मान/RSBY जैसी योजना का संचालन केवल डाटा एंट्री तक सीमित नहीं है। इसके विभिन्न स्तरों पर अधिष्ठाता, अस्पताल अधीक्षक/सिविल सर्जन, हॉस्पिटल कंसल्टेंट, नोडल एवं सह-नोडल अधिकारी, विभागाध्यक्ष तथा संबंधित चिकित्सकों की निर्धारित भूमिकाएं होती हैं।संचालन पर डाटा एंट्री ऑपरेटरों के समूह का कथित नियंत्रण

मामले का एक और गंभीर पहलू सामने आ रहा है। आरोप है कि आयुष्मान/RSBY योजना का वास्तविक दैनिक संचालन कुछ चुनिंदा डाटा एंट्री ऑपरेटरों के समूह के प्रभाव में चल रहा है। पोर्टल पर डाटा एंट्री से लेकर प्रकरणों की प्रोसेसिंग एवं प्रोत्साहन राशि से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यों में इसी समूह का प्रभाव बना हुआ है।

यह भी आरोप है कि नए डाटा एंट्री ऑपरेटरों को इस व्यवस्था में स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने दिया जाता। उन्हें कार्य सीखने अथवा जिम्मेदारी संभालने में सहयोग देने के बजाय कथित रूप से मानसिक दबाव एवं प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण नए ऑपरेटर नही मिलते। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न प्रोत्साहन राशि के वितरण को लेकर है। आरोप है कि इसी प्रभावशाली समूह से जुड़े कुछ डाटा एंट्री ऑपरेटरों के खातों में लाखों रुपये तक की प्रोत्साहन राशि पहुंची, जबकि अन्य ऑपरेटरों को अपेक्षाकृत बहुत कम अथवा कोई राशि नहीं मिली।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इतनी बड़ी योजना का संचालन किसी एक डाटा ऑपरेटर अथवा कर्मचारी के स्तर पर नहीं होता। इसकी प्रशासनिक एवं चिकित्सकीय व्यवस्था में अधिष्ठाता, सिविल सर्जन/अस्पताल अधीक्षक, हॉस्पिटल कंसल्टेंट, योजना के नोडल एवं सह-नोडल अधिकारी, संबंधित विभागाध्यक्ष तथा उपचार करने वाले चिकित्सकों की अलग-अलग स्तर पर भूमिका रहती है। अस्पताल अधीक्षक की प्रशासनिक भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि लाखों-करोड़ों रुपये की प्रोत्साहन राशि के निर्धारण, में अनियमितता हुई है, तो जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित कैसे हो सकती है। इस मामले में अस्पताल अधीक्षक डॉ आरसी आर्या से संपर्क नहीं हो पाने के कारण उनका पक्ष नहीं लिया जा सका। 

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)