अंबिकापुर। खबरी गुल्लक
इंजीनियरिंग कॉलेज अंबिकापुर के प्राचार्य और समसामयिक घटनाओं के चिंतक डॉ राम नारायण खरे ने दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए घटना को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि डिजिटल क्रांति ने ज्ञान तक पहुँच को पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल बना दिया है। आज एक मोबाइल फोन के माध्यम से दुनिया की लगभग हर जानकारी कुछ ही क्षणों में उपलब्ध हो जाती है। यह मानव सभ्यता की एक बड़ी उपलब्धि है। किंतु इसी के साथ एक गंभीर चुनौती भी हमारे सामने खड़ी है यदि पुस्तकों, अध्ययन, संवाद और चिंतन का स्थान केवल रील, शॉर्ट वीडियो और एल्गोरिद्म आधारित सूचनाएँ लेने लगें, तो समाज में ज्ञान की जगह भ्रम, विवेक की जगह तात्कालिक प्रतिक्रिया और उत्तरदायित्व की जगह भीड़-मानसिकता विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है। विकसित भारत के निर्माण का दायित्व आज के युवाओं के कंधों पर है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उनकी सोच अध्ययन, अनुभव, तर्क और सत्यापित तथ्यों पर आधारित हो, न कि केवल वायरल सामग्री, अपुष्ट संदेशों या डिजिटल ट्रेंड पर। सूचना और ज्ञान में अंतर होता है। सूचना केवल तथ्य बता सकती है, जबकि ज्ञान उन तथ्यों का सही संदर्भ, विश्लेषण और उचित उपयोग करना सिखाता है। यही अंतर एक उत्तरदायी नागरिक और भीड़ का हिस्सा बनने वाले व्यक्ति के बीच की दूरी तय करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा विकसित Universal Human Values (UHV) का मूल उद्देश्य भी यही है कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम न रहे, बल्कि सही समझ (Right Understanding), नैतिकता, उत्तरदायित्व, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का विकास करे। UHV यह स्पष्ट करता है कि सही समझ के आधार पर लिया गया निर्णय व्यक्ति, परिवार, समाज, प्रकृति और राष्ट्र सभी के हित में होता है। शिक्षा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब वह व्यक्ति को केवल कुशल पेशेवर ही नहीं, बल्कि उत्तरदायी नागरिक भी बनाए। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल विषय पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, भ्रम से सत्य और असंयम से विवेक की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है। हमारे प्रथम गुरु माता-पिता हैं। विद्यालय और विश्वविद्यालय के शिक्षक जीवन की दिशा देते हैं। संविधान हमें नागरिक कर्तव्यों का बोध कराता है और समाज हमें व्यवहार की शिक्षा देता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। वास्तविक गुरुदक्षिणा उपहार या धन नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा, अनुशासन, सेवा, राष्ट्रभक्ति और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में उतारना है।
आज सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने विचार कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह अवसर जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। किसी भी सार्वजनिक विषय चाहे वह परीक्षा हो, न्यायिक प्रक्रिया, प्रशासनिक निर्णय या राष्ट्रीय महत्व का कोई मुद्दा उस पर राय बनाने से पहले तथ्य, प्रमाण और विधिक प्रक्रिया को समझना आवश्यक है। अधूरी जानकारी के आधार पर बनाई गई राय न केवल व्यक्ति को भ्रमित करती है, बल्कि समाज में अविश्वास और अनावश्यक तनाव भी उत्पन्न कर सकती है। यदि कहीं त्रुटि या अनियमितता है तो उसका समाधान संवैधानिक और विधिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही होना चाहिए। यही परिपक्व लोकतंत्र का आधार है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, किंतु उसके साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है। अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) स्पष्ट करता है कि यह अधिकार भारत की संप्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, मानहानि तथा अन्य विधिसम्मत सीमाओं के अधीन है। साथ ही अनुच्छेद 51A प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह संविधान, राष्ट्रीय प्रतीकों, राष्ट्रीय संस्थाओं तथा भारत की एकता और अखंडता का सम्मान करे। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, परंतु असम्मान कभी आवश्यक नहीं होता। विचारों का मतभेद लोकतंत्र की शक्ति है, जबकि कटुता और अवमानना उसकी कमजोरी।
भारतीय संस्कृति सदैव समरसता, सह-अस्तित्व और मानवता की पक्षधर रही है। वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धांत सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की प्रेरणा देता है। भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, उत्तरदायित्व और लोककल्याण का आदर्श प्रस्तुत करता है। भगवद्गीता का संदेश यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन यह बताता है कि समाज अपने आदर्शों से सीखता है। इसलिए शिक्षकों, अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन, मीडिया और प्रत्येक जागरूक नागरिक का आचरण समाज के लिए प्रेरणा बनता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने अपने नागरिकों को व्यापक स्तर पर निःशुल्क टीकाकरण उपलब्ध कराया तथा अनेक देशों को वैक्सीन सहायता देकर मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया। यह केवल कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस भावना का उदाहरण था जिसमें संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना की जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल तकनीक को अपना शत्रु नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ उपयोग किए जाने वाला शक्तिशाली साधन मानें। रील और शॉर्ट वीडियो ज्ञान का विकल्प नहीं हो सकते वे केवल प्रारंभिक परिचय या रुचि जगाने का माध्यम हो सकते हैं। वास्तविक ज्ञान अध्ययन, संवाद, अनुभव, शोध और चिंतन से प्राप्त होता है। युवाओं को चाहिए कि वे डिजिटल माध्यमों का उपयोग सीखने, नवाचार, अनुसंधान, कौशल विकास और राष्ट्र निर्माण के लिए करें, न कि अफवाह, नफरत या सामाजिक विभाजन को बढ़ाने के लिए।
यह लेख किसी राजनीतिक दल, विचारधारा, संगठन अथवा व्यक्ति-विशेष के समर्थन या विरोध में नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल भारतीय संविधान, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, गुरु-परंपरा, भारतीय संस्कृति, उत्तरदायी अभिव्यक्ति, डिजिटल साक्षरता तथा राष्ट्रहित के प्रति जागरूकता को प्रोत्साहित करना है। लोकतंत्र में विचारों की विविधता का सम्मान आवश्यक है, किंतु प्रत्येक अभिव्यक्ति तथ्याधारित, संविधानसम्मत, शालीन और उत्तरदायित्वपूर्ण होनी चाहिए।
यदि हम ज्ञान को सूचना से ऊपर, सत्य को अफवाह से ऊपर, संवाद को विवाद से ऊपर, कर्तव्य को अधिकार के साथ संतुलित रखते हुए राष्ट्रहित को व्यक्तिगत, वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रख सकें, तो यही सच्ची गुरुदक्षिणा होगी। राष्ट्र किसी एक व्यक्ति, एक दल, एक परीक्षा या एक विचार से कहीं बड़ा है। शिक्षित, मूल्यनिष्ठ और उत्तरदायी नागरिक ही विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यही सार है, यही भारतीय संविधान की भावना है और यही भारत की सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है।




