अंबिकापुर। मौसम वैज्ञानिक अक्षय मोहन भट्ट ने आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं को लेकर बरते जाने वाले विशेष सावधानी और गाज गिरने के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस समय जब ग्रीष्म ऋतु का अंत और वर्षा ऋतु का प्रारम्भ का समय है तब वायुमण्डल में वज्रपात की घटना के लिए परिस्थितियां बेहद अनुकूल हो जाती हैं। वास्तव में मेघ गर्जन के लिए विशेष प्रकार के बादलों का बनना आवश्यक होता है। ये बादल प्रारम्भ में गोभी के फूल की तरह दिखते हैं जो ऊपर उठते हुए किसी ऊंचे मीनार या टावर का शक्ल अख्तियार कर लेते हैं और फिर वे थोड़ा छितर कर काले बादलों का शीट या तह बना लेते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में इन बादलों को क्युमलस (कपासी) बादल कहते हैं जो विद्धुत आवेशों से परिपक्व हो कर क्युमलोनिम्बस (कपासी वर्षी) बादल बन जाते हैं।
यदि हम अपने ब्रह्मांड के पूरे आकाश को आठ बराबर भागों में बांट लें तो गरजने वाले बादलों की मात्रा उनमें मात्र एक भाग या उससे भी कम होती है। इन बादलों की अधिकतम मात्रा आठ भागों में दो तक ही हो सकती है। इन भागों को हम ‘ऑक्टा’ कहते हैं। मतलब आठ ऑक्टा में अधिकतम क्युमलोनिम्बस बादलों की मात्रा दो ऑक्टा तक होती है। एक ऑक्टा से अधिक होने पर तेज गर्जना और दो या उससे अधिक हो जाने पर अति भीषण गर्जना होती है। वज्रपात की शक्ति इस समय विस्फोटक स्थिति में पहुंच जाती है जो भारी नुकसान पहुंचाती है।
गर्जन वाले बादलों के बनने के लिए आवश्यक मौसमी तत्वों में प्रमुख हैं वायुमण्डल में नमी की पर्याप्त मात्रा, वायुमण्डल का असन्तुलित होना और वायु का ऊपर उठने में समर्थ होना।
वर्तमान समय में सुबह के समय धूप की तपिश तेज होती है। अभी दो दिन पहले अम्बिकापुर सहित पूरे मध्य भारत के वातावरण का तापमान लगातार 40℃ के ऊपर रहा था। अब जब बंगाल की खाड़ी से नमी की पर्याप्त मात्रा आनी प्रारम्भ हुई है तब नमी की न्यूनतम मात्रा जो 20 से 25 प्रतिशत तक रहती थी वह अब 50 से 60 प्रतिशत दर्ज की जा रही है। अर्थात वातावरण में नमी की मात्रा पर्याप्त बढ़ चुकी है।
दिन के पूर्वाह्न में धूप की तपिश से धरातल की हवा गर्म और हल्की हो कर ऊपर उठ रही है और धरातल में उत्पन्न वायु की रिक्तता को भरने के लिए आसपास की ठंडी वजनी हवा नीचे आ रही है। इससे दोपहर बाद वायुमण्डल को अस्थिर करने की अनुकूल स्थितियां निर्मित हो रही हैं जिससे वायुमंडल में दो विपरीत आवेश और तापमानों के बादलों के टकराने में मदद कर रही हैं।
यदि क्षेत्र विशेष पर चर्चा करें तो इसके लिए अनुकूल क्षेत्र पठारी और पहाड़ी विशेष होते हैं। वहां नमी की मात्रा मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है। अभी हम लगातार मैनपाट, सामरी पाट, बलरामपुर, वाड्रफनगर आदि क्षेत्रों में तड़ित घात और इसकी चपेट में आने से जन और पशुओं के हताहत होने का समाचार पा रहे हैं।
दिन का उत्तरार्ध तड़ित गर्जन की घटना के लिए बेहद अनुकूल होता है और तड़ित घात की घटना ऊंचे टॉवर, ऊंचे भवन, ऊंचे और एकाकी पेड़ो के आसपास अधिक होता है। अतः तड़ित सुरक्षा के उपायों का पालन करते हुए तड़ित संभावित स्थानों पर जाने, या पशुओं को रखने से बचना चाहिए।





