मैनपाट( महेश यादव)। बारिश के पूर्व अपने आशियाना को संवारने में जुटे वनवासियों के लिए जंगली हाथियों का दल न सिर्फ आफत बन रहा है बल्कि वनोपज पर निर्भर रहने वाली इनकी 60 फ़ीसदी अर्थव्यवस्था भी छीन रही है। हाथियों का यह उत्पात वनवासियों के लिए किसी जलजले से कम नहीं है। वन परिक्षेत्र मैनपाट और रायगढ़ वन मंडल के बोरो रेंज से लगे सरहदी इलाकों में 14 जंगली हाथियों का दल लंबे समय से विचरण कर रहा है। बुधवार की रात इस दल से अलग हो कुछ हाथी पुनः ग्राम पटकुरा में पहुंच गए और एक घर बुरी तरह से तोड़ कर तहस नहस कर दिया। गांव में हाथियों के आ जाने से ग्रामीणों में हड़कंप मचा रहा। आज दूसरे दिन गुरुवार को प्रातः ग्राम बरडांड और बरवावली के बीच जंगल में विचरण करते देखे गए। रेंजर फेंकू चौबे के नेतृत्व में विभाग का मैदानी अमला हाथियों की निगरानी में जुटा हुआ है। वन विभाग की टीम रात में ही गांव में पहुंच गई और ग्रामीणों को सुरक्षा के लिए हाथियों के समीप नही जाने की समझाइश दी गई। इधर बारिश के पूर्व घर क्षतिग्रस्त होने से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ रही है। उन्हे बाल बच्चों के साथ भटकना पड़ेगा।
साल बीज, जलाऊ लकड़ी संग्रहण पर भी संकट -
मौजूदा समय में ग्रामीण, वनवासी साल बीज जैसे वनोपज के संग्रहण में लगे हुए हैं। जंगल में हाथियों के होने से मैनपाट क्षेत्र के ग्रामीणों में भय है और वे वनोपज के लिए जंगल नही जा पा रहे हैं। बारिश पूर्व जलाऊ लकड़ी संग्रहण पर भी असर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि साल बीज, तेंदू पत्ता, चिरौंजी, लाख, महुआ डोरी सहित अन्य वनोपज के भरोसे उनकी लगभग 60 फीसदी अर्थव्यवस्था होती है, इसके प्रभावित होने का उनकी आजीविका पर भी असर पड़ रहा है।
जीवियों का कहना है कि शासकीय वन भूमि पट्टे के लिए मौजूदा समय में हरे भरे लहलहाते जंगल को उजाड़ कब्जे का खेल चल रहा है, और आश्चर्यजनक ढंग से ऐसे अधिकांश कब्जा धारियों को नियमों का मखौल उड़ाते हुए पट्टा दे भी दिया जा रहा है। यही वजह है कि जंगल के सिमटने से जंगली जानवरों का रहवासी इलाकों में प्रवेश करने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। कुछ दिनों पहले एक कोटरी मैनपाट के तिब्बती बौद्ध मंदिर परिसर में घुस गया था। बुद्धिजीवियों का कहना है कि जानवरों का आशियाना उजड़ने के पीछे मौजूदा व्यवस्था भी जिम्मेदार है, अब समय आ गया है कि इस पर रोक लगाई जाए.. !
जंगल का बांट रहे पट्टा.. तो जानवर जायेंगे कहां ..?
बुद्धि
जीवियों का कहना है कि शासकीय वन भूमि पट्टे के लिए मौजूदा समय में हरे भरे लहलहाते जंगल को उजाड़ कब्जे का खेल चल रहा है, और आश्चर्यजनक ढंग से ऐसे अधिकांश कब्जा धारियों को नियमों का मखौल उड़ाते हुए पट्टा दे भी दिया जा रहा है। यही वजह है कि जंगल के सिमटने से जंगली जानवरों का रहवासी इलाकों में प्रवेश करने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। कुछ दिनों पहले एक कोटरी मैनपाट के तिब्बती बौद्ध मंदिर परिसर में घुस गया था। बुद्धिजीवियों का कहना है कि जानवरों का आशियाना उजड़ने के पीछे मौजूदा व्यवस्था भी जिम्मेदार है, अब समय आ गया है कि इस पर रोक लगाई जाए.. !





