प्रो. रामजी मंडावी द्वारा विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष रचना... ऐ भारत के मूल निवासी, छिनी जा रही धरती तेरी, आसमान में चाँद कहाँ ? आज तेरी पहचान कहाँ ? ऐ भारत के मूल निवासी, आज तेरी पहचान कहाँ ...
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अगस्त 09, 2023
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मूल निवासी...
ऐ भारत के मूल निवासी,
छिनी जा रही धरती तेरी, आसमान में चाँद कहाँ ?
आज तेरी पहचान कहाँ ?
ऐ भारत के मूल निवासी,
आज तेरी पहचान कहाँ ?
तू निश्चल, निर्मल,विचरण करता.
मुक्त गगन में मस्त पवन में,
तेरे पुरखों की वो हिरयाली,
तेरे उपवन की वो फुलवारी
एक-एक कर ध्वस्त हो रहे,
अब धरती में जान कहाँ ?
ऐ भारत के मूल निवासी,
आज तेरी पहचान कहाँ ?
जल, जंगल, जमीन तेरी थी,
कल-कल झरनों की नीर तेरी थी
फल-फूलों से लदे हुए वो,
सावन झूले सा बँधे हुए
नदिया, नरवा झीलें तेरी थी, कंद-मूल, फल-फूलें तेरी थी
सूख चली अब तो बसंत भी,
सावन की पहचान कहाँ ?
ऐ भारत के मूल निवासी
आज तेरी पहचान कहाँ ?
ना गुजरे पल की परवाह,
ना भविष्य की चिंता थी,
जीता रहा बस वर्तमान को,
वो तेरी अग्नि परीक्षा थी,
वक्त गुजरता चला गया,
कभी यहाँ रहा कभी वहाँ रहा,
जीवन के तेरे इस सफर में,
तेरे पग के वो निशान कहाँ ?
ऐ भारत के मूल निवासी,
आज तेरी पहचान कहाँ ?
जब-जब वक्त ने ली अंगड़ाई,
छिनी गई तेरी तन्हाई ,
अब तो वक्त आया है ऐसा,
अपने घर में अंजान सा जैसा,
तेरे लिए जो थे अंजाने,
वही अड़े हैं सीना ताने ,
पूछा जा रहा तू अपने घर में,
जाति बता तेरा धर्म बता ?
बेबस तेरी इन होंठों पे,
पहले की मुस्कान कहाँ ?
ऐ भारत के मूल निवासी,
आज तेरी पहचान कहाँ ...?
.......
प्रो. रामजी मण्डावी
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