अंबिकापुर/ मैनपाट।
मैनपाट के घने जंगलों से सटा एक गांव जंगलपारा ऐसी घटना का साक्षी बना जिसने गांव की पुरानी पारिवारिक परंपराओं और मानवता की गर्माहट को फिर जिंदा कर दिया। माझी समाज के एक गरीब परिवार की बहू ने अपनी 90 वर्षीय सास को पीठ पर बैठाकर करीब छह किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंची ताकि उन्हें पेंशन मिल सके। कारण था ई-केवाईसी न होने से पेंशन जारी न होना एक तकनीकी प्रकिया जिसने बुजुर्गों के सामने वास्तविक जीवन की चुनौतियाँ खड़ी कर दीं। वर्तमान समय में वृद्धा आश्रम सभ्य समाज के लिए कलंक बने हुए हैं। पारिवारिक असंवेदनशीलता से बुजुर्गों के लिए यह आश्रम ठिकाना बनता है। मगर गांवों में आज भी रिश्ता जिंदा है और निर्दयी समाज के लिए प्रेरणा।
जानकारी के अनुसार मैनपाट के जंगल पारा की निवासी वृद्धा नियमित पेंशन की हकदार हैं, किन्तु उनके पास ई-केवाईसी नहीं होने के कारण बैंक से भुगतान रुका हुआ था। बैंक मित्र सामान्य दिनों में वृद्धा के घर पहुँचकर पेंशन का भुगतान कर दिया करते थे, पर पहचान सत्यापन हेतु कागजी उपस्थिति अनिवार्य होने पर बहू ने हिम्मत दिखाई और अपनी सास को पीठ पर उठाकर बैंक की ओर चल पड़ी। छह किलोमीटर की दूरी कठिन रास्तों और गर्मी के बावजूद बहू का हौसला और समर्पण देखने लायक था।
यह घटना न केवल एक परिवार की निजी कहानी है बल्कि समाज के लिए बड़ा संदेश भी रखती है। मैनपाट की यह बहू, जिसका नाम स्थानीय लोगों ने न केवल तारीफों से नवाजा बल्कि उनकी निस्वार्थ सेवा को सामूहिक आदर मिला, ने अपने कर्म से बताया कि बुजुर्ग बोझ नहीं, परिवार की धरोहर हैं। ग्रामीण समाज में आज भी बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सेवा की भावना जिंदा है , चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
स्थानीय बैंक शाखा का कहना है कि सरकारी निर्देशों के तहत ई-केवाईसी अनिवार्य है ताकि पेंशन योजनाओं का दुरुपयोग रोका जा सके और सही लाभार्थियों तक रकम पहुंचे। हालांकि बैंक अधिकारियों ने वृद्धा के मामले में तत्काल मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए समस्या का समाधान ढूँढने का आश्वासन दिया। बैंक मित्र और स्थानीय प्रशासन को भी इस तरह के मामलों के प्रति संवेदनशील नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है ताकि बुजुर्गों को असुविधा का सामना न करना पड़े।
समुदाय के बुजुर्ग और सामाजिक कार्यकर्ता इस घटना को ग्रामीण संस्कारों और पारिवारिक निष्ठा का उदाहरण बता रहे हैं। उनका मानना है कि आधुनिक प्रक्रियाएँ जरूरी हैं, पर नीति बनाते समय जमीनी हकीकतों और उन लोगों की सीमाओं का भी ख्याल रखा जाना चाहिए जिनके लिए ये सेवाएँ जीवन रेखा समान हैं।
मैनपाट की यह तस्वीर शहरों और गाँवों दोनों में लोगों के दिलों को छू रही है । एक सादे पर कष्ट सहने वाले कर्म से जुड़े संदेश के साथ: इंसानियत पहले है, और नियमों को लागू करते समय सहानुभूति और विस्तार पर विचार अनिवार्य है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि सेवा और संस्कार आज भी ग्रामीण जीवन की आत्मा हैं और इन्हें संजोना हम सबकी जिम्मेदारी है।




