नित नूतन पावन परम, तुलसी तेरे छंद, दुखमोचन, संकटहरण, सुखकर निर्मल चंद - मुकंदलाल साहू। महाकवि तुलसीदास की जयंती पर तुलसी साहित्य का कवि-सम्मेलन

नित नूतन पावन परम, तुलसी तेरे छंद, दुखमोचन, संकटहरण, सुखकर निर्मल चंद - मुकंदलाल साहू। महाकवि तुलसीदास की जयंती पर तुलसी साहित्य का कवि-सम्मेलन

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अंबिकापुर।खबरी गुल्लक 

कविकुल शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर तुलसी साहित्य समिति द्वारा शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पूर्व व्याख्याता सच्चिदानंद पांडेय की अध्यक्षता में सरस कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया। गीता मर्मज्ञ पं. रामनारायण शर्मा मुख्य अतिथि तथा कवि चंद्रभूषण मिश्रा, जय गुप्त और प्रदीप सोनी 'आदर्श' कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। संचालन कवयित्री आशा मिश्रा ने किया।

   कार्यक्रम का शुभारंभ महाकवि तुलसीदास और मां वागेश्वरी के छायाचित्रों के समक्ष दीप-प्रज्वलन से हुआ। पं. रामनारायण शर्मा ने कहा कि हिंदी साहित्य में तुलसीदास के समान दूसरा कवि नहीं हुआ। जब सनातनी हिंदू अपने धर्म-कर्म से वंचित हो गए थे, तब एक ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम महामानव के चरित्र-चित्रण की आवश्यकता थी, जिससे प्रेरणा प्राप्त कर लोगों का जीवन मर्यादित और संस्कारित हो सके तथा पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में सुधार संभव हो। तुलसीदास ने भगवान् राम के विमल चरित्र को आधार बनाकर संवत् 1631 में लोकभाषा अवधी में 'रामचरितमानस' नामक सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य की रचना की। सामाजिक उत्थान में राम का जीवन वृत्तांत अत्यंत कारगर सिद्ध हुआ। उन्होंने भगवान् राम और शिव को एक-दूसरे का उपासक बताकर शैव-वैष्णव के मध्य जारी संघर्ष को समाप्त किया। अपने काव्य के माध्यम से तुलसी ने जनता में परस्पर प्रेम, मित्रता, सद्भावना व भाईचारे की स्थापना, गृहस्थ जीवन में पवित्रता, आध्यात्मिक व धार्मिक मर्यादाओं का पालन, मातृ-पितृ, ईश्वर और राष्ट्रभक्ति, सेवा भावना, भ्रातृ-प्रेम, आसुरी शक्तियों का विनाश, राज्य से विरक्ति और राम-राज्य की स्थापना का ऐसा सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया, जो आज की स्थिति में अत्यंत प्रासंगिक एवं अनुकरणीय है। रामचरितमानस के दिव्य संदेशों के व्यापक प्रचार-प्रसार की आज आवश्यकता है, ताकि एक भयरहित, स्वस्थ, समृद्ध व सुसंस्कृत समाज और राष्ट्र का निर्माण हो सके।पं. सच्चिदानंद पांडेय ने तुलसी के बाल्यकाल और रचनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उन्हें उनके माता-पिता ने जन्म के समय ही त्याग दिया था और उनका पालन-पोषण मुनिया नामक दासी ने किया था। गोस्वामी जी ने लिखा भी है- "माता-पिता जग जाइ तज्यो, विधि हूं न लिखी कछु भाल भलाई।" तुलसी का बचपन बड़ी ही दयनीय अवस्था में व्यतीत हुआ था। 'रामचरितमानस', 'दोहावली', 'कवितावली', 'गीतावली', 'विनय पत्रिका', 'पार्वती मंगल', 'जानकी मंगल', 'बरवै रामायण', 'हनुमान बाहुक' आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। तुलसीदास पत्नी की प्रेरणा से ही वैराग्य धारण कर भक्ति की ओर उन्मुख हुए थे। पं.श्यामबिहारी पांडेय ने रामचरितमानस के सभी पात्रों को प्रासंगिक बताते हुए कहा कि तुलसी के काव्य में आशावाद का स्वर प्रमुख रूप से विद्यमान है। इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के दुष्ट-संहारक रूप की आराधना करते हुए, उनके द्वारा स्वभक्तों के कष्ट हरने और धरा से पाप मिटाने के लिए शीघ्र अवतार लेने की बात कही गई है। पंडित अरविंद मिश्रा ने मानस रोगों का ज़िक्र करते हुए लोगों से उन पर नियंत्रण करने की अपील की।

 कवि-सम्मेलन में संस्था के अध्यक्ष मुकुंदलाल साहू ने अपने दोहे में तुलसी के छंदों को परम पवित्र बताया- नित नूतन पावन परम, तुलसी तेरे छंद। दुखमोचन संकटहरण, सुखकर निर्मल चंद। कवि जय गुप्त ने रामचरितमानस को तुलसी की कालजयी कृति बताया- उस महाविभूति के वंशज हम हैं, जिसने मानस हमें उपहार दिया। उस कालजयी रचना ने जग में, राम कथा का संचार किया। कवयित्री माधुरी जायसवाल ने प्रत्येक स्वतंत्रता सेनानी को प्रणाम निवेदित किया- स्वतंत्र भारत के सूत्रधार हर बलिदानी को नमन करूं। आशीष निरंतर पा उनका, इस नवभारत को चमन करूं। अंजू पांडेय ने भारत की पावन मिट्टी के प्रति सम्मान की वकालत की- गंगा का पावन जल, हिमगिरि का अभिमान रहे। चंदन है मेरे देश की मिट्टी, इसका सम्मान रहे।आर.एल. विश्वकर्मा ने नारी-स्वतंत्रता व विकास पर ख़ासा ज़ोर दिया- मेरे कटे परों को बस इतना वितान दे दो। उड़ना चाहती हूँ मैं, खुला आसमान दे दो। 

 इन कवियों के अलावा कवि-सम्मेलन में कृष्णकांत पाठक का भक्ति-गीत-भगवान तेरे दर से मैं खाली तो न जाऊंगा, विश्वास है इतना कि सवाली तो न जाऊंगा, प्रदीप सोनी 'आदर्श' की कविता- हम भारत के नौजवान हैं, चंद्रभूषण मिश्रा 'मृगांक' की कविता- वह रूप बदलना चाहिए, वह रंग बदलना चाहिए। समय की मांग हो तो संविधान भी सप्रसंग बदलना चाहिए, अंजू प्रजापति की कविता- काश ! जीवनकाल समाप्त होने से पहले मैं यह दृश्य देख पाती, जहां मेरे देश में इंसानियत पहले है और पीछे है जाति, आशा मिश्रा की- स्वतंत्र हुए हैं हम, स्वतंत्रता दिवस पर जनता को मिली आज़ादी की ताकत और कवि अजय सागर की रचना- अब दूर गगन की छांव में, सागर चल अपने गांव में- ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। अंत में आभार संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष माधुरी जायसवाल ने जताया। इस दौरान केके त्रिपाठी, दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव सहित अन्य काव्यप्रेमी उपस्थित रहे। 


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